काली पूजा का महत्व और परंपराएँ
काली पूजा भारत के प्रमुख त्योहारों में से एक है, जो विशेष रूप से उड़ीसा, पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों में दिवाली के साथ मनाई जाती है। यह त्योहार हिंदू पंचांग के अनुसार कार्तिक मास की अमावस्या को आयोजित होता है, जो सामान्यतः दीपावली के दिन पड़ता है। इस दिन माता काली की पूजा विधिपूर्वक की जाती है, और मान्यता है कि यदि मंत्रों का जप श्रद्धा से किया जाए, तो माता की कृपा सदैव बनी रहती है। माता काली को शक्ति, साहस और ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है, और इस दिन विशेष पूजा और व्रत रखे जाते हैं।
माता काली के मंत्र और पूजा विधि
काली पूजा के दौरान विभिन्न मंत्रों का उच्चारण किया जाता है, जो माता की शक्ति को जागृत करने में सहायक होते हैं। इनमें से प्रमुख मंत्र हैं: “ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं कालिके क्लीं श्रीं ह्रीं ऐं” और “ॐ क्रीं काली भद्रकाली मंत्र”। इसके अलावा, महाकाली का बीज मंत्र “ॐ क्रीं कालिकायै नमः” और अन्य मंत्र भी पूजा में उपयोग किए जाते हैं। इन मंत्रों का जप श्रद्धा और भक्ति के साथ करने से माता काली की कृपा प्राप्त होती है। पूजा के दौरान लाल, हरे और पीले रंग के वस्त्र पहनना शुभ माना जाता है, जो शुभता और ऊर्जा का संचार करते हैं।
माता काली को प्रिय फूल और शुभ रंग
माता काली को विशेष रूप से गुड़हल और लाल रंग के फूल अति प्रिय हैं। इन फूलों का प्रयोग पूजा में किया जाता है, जो माता की भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक हैं। साथ ही, काली पूजा के दिन लाल, हरे और पीले रंग के वस्त्र धारण करना शुभ माना जाता है, क्योंकि ये रंग सकारात्मक ऊर्जा और सौभाग्य को बढ़ाते हैं। इस त्योहार का महत्व न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक भी है, जो भक्तों को शक्ति और साहस का संबल प्रदान करता है।










