गोवर्धन पूजा का महत्व और परंपराएँ
गोवर्धन पूजा हिंदू धर्म का एक विशेष त्योहार है, जो कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को मनाया जाता है। इस पर्व का मुख्य उद्देश्य भगवान श्रीकृष्ण की उस अद्भुत लीला का स्मरण करना है, जब उन्होंने देवराज इंद्र के प्रकोप से गोकुलवासियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठा उंगली पर उठा लिया था। इस दिन घरों और मंदिरों में गोबर से पर्वत बनाकर उसकी पूजा की जाती है। साथ ही, भारत के कई हिस्सों में इस दिन 56 प्रकार के व्यंजन भोग के रूप में चढ़ाए जाते हैं, जो इस पर्व की भव्यता को दर्शाते हैं।
गोवर्धन पूजा की आवश्यक सामग्री
इस पावन पर्व को सफल बनाने के लिए विभिन्न सामग्रियों की आवश्यकता होती है। इनमें प्रमुख हैं लाल कपड़ा, पंचामृत बनाने का सामान, गोबर, सुपारी, गंगाजल, आम के पत्ते, मिट्टी का दीया, घी, बाती या रुई, नारियल, कपूर, अगरबत्ती, धूपबत्ती, फूल, रोली, हल्दी, अक्षत, पान के पत्ते, पुष्पमाला, तुलसी के पत्ते और लौंग। इन सभी वस्तुओं का प्रयोग पूजा के दौरान श्रद्धा और भक्ति के साथ किया जाता है।
तिथि, शुभ मुहूर्त और रंगीन परंपराएँ
गोवर्धन पूजा वर्ष 2025 में 22 अक्टूबर को मनाई जाएगी। इस दिन का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजकर 26 मिनट से शुरू होकर 8 बजकर 42 मिनट तक रहेगा। पूजा के दौरान पीला, हरा और नारंगी रंग के कपड़े पहनना शुभ माना जाता है, जो इस त्योहार की सकारात्मक ऊर्जा और उत्साह को दर्शाते हैं। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मेलजोल का भी अवसर है।








