गोवर्धन महाराज की आरती का महत्व और परंपरा
गोवर्धन महाराज की आरती भगवान श्रीकृष्ण के प्रतीक माने जाने वाले गोबर से बने पर्वत की पूजा का अभिन्न हिस्सा है। यह पर्व प्रकृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है। पूजा के दौरान भगवान की पूजा-पाठ, भोग अर्पण के बाद, विशेष रूप से गोवर्धन महाराज की आरती का पाठ किया जाता है, जो भक्तों के बीच अत्यंत श्रद्धा से किया जाता है। इस आरती में भगवान की महिमा का गुणगान किया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा प्रकट की जाती है।
गोवर्धन पूजा का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
माना जाता है कि गोवर्धन पूजा का प्रारंभ द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण के समय से हुआ था। इस दिन लोग गोबर से पर्वत बनाकर उसकी पूजा करते हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण की कथा से जुड़ा हुआ है। यह पर्व न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह प्रकृति के संरक्षण और सम्मान का भी प्रतीक है। इस दिन 56 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाया जाता है, जो इस त्योहार की भव्यता को दर्शाता है।
मंत्र और पूजा विधि
गोवर्धन पूजा के दिन विशेष मंत्रों का जाप किया जाता है, जैसे “गोवर्धन धराधार गोकुल त्राणकारक”। इन मंत्रों का उच्चारण भक्तों को भगवान की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त करने में मदद करता है। पूजा के दौरान भगवान श्रीकृष्ण की कथा का पाठ भी किया जाता है, जिससे भक्तों में सुख-समृद्धि और खुशहाली का संचार होता है। यह त्योहार न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का भी अभिन्न हिस्सा है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है।











