छठ पूजा का दूसरा दिन: खरना का महत्व और परंपराएँ
छठ पूजा के दौरान दूसरा दिन खासतौर पर ‘खरना’ के नाम से जाना जाता है, जिसमें व्रती पूरे दिन निर्जल व्रत रखते हैं। शाम को शुद्धता के साथ खीर का भोग लगाकर व्रत का समापन किया जाता है। इस दिन बनाई जाने वाली खीर का विशेष महत्व माना जाता है, क्योंकि यह छठ पूजा में एक पवित्र और शुभ प्रसाद के रूप में प्रतिष्ठित है।
खरना की खीर का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
खरना की खीर को छठी मैया का प्रिय प्रसाद माना जाता है, इसलिए इसे विशेष रूप से गुड़ और चावल से तैयार किया जाता है। यह व्रती को शक्ति और ऊर्जा प्रदान करने वाली होती है, क्योंकि अगले 36 घंटों तक बिना पानी के व्रत रखा जाता है। इस खीर का सेवन शरीर को आवश्यक ऊर्जा और शक्ति प्रदान करता है। पारंपरिक रूप से, इसे मिट्टी के नए चूल्हे पर, आम की लकड़ी जलाकर और पीतल के बर्तन में पकाया जाता है, जो इसकी पवित्रता और शुद्धता को बनाए रखता है।
गुड़ वाली खीर क्यों खास है?
गुड़ को शुद्ध और पाचन में अच्छा माना जाता है, जो शरीर को ऊर्जा देने के साथ-साथ व्रती को अगले कठोर व्रत के लिए ताकत भी प्रदान करता है। इसके अलावा, गुड़ शुभता और रोगहरता का प्रतीक माना जाता है, जिससे यह खीर और भी अधिक पवित्र और लाभकारी बन जाती है।
खरना का आयोजन और नियम
खरना के दिन व्रती पूरे दिन बिना पानी के व्रत रखते हैं। शाम को नदी, तालाब या घर के पूजा स्थल की सफाई की जाती है। इसके बाद खीर, रोटी और केला का भोग लगाया जाता है। व्रती सबसे पहले भगवान सूर्य और छठी मैया को अपना पहला निवाला अर्पित करता है, उसके बाद ही प्रसाद सभी श्रद्धालुओं में वितरित किया जाता है।
खरना कब मनाया जाता है?
छठ पूजा के दूसरे दिन, जब व्रती पूरे दिन फलाहार ग्रहण करते हैं, शाम को खीर का प्रसाद ग्रहण किया जाता है। यह दिन खासतौर पर खरना के नाम से जाना जाता है, जिसमें व्रतधारी निर्जला व्रत रखते हुए सूर्यास्त के बाद खीर का सेवन करते हैं।
खरना पर क्यों केवल खीर ही बनाई जाती है?
गुड़ और चावल से बनी खीर को छठी मैया का प्रिय प्रसाद माना जाता है, और इसे पूजा में पवित्र सात्त्विक भोजन के रूप में उपयोग किया जाता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि यह प्रसाद व्रत और पूजा की पवित्रता को बनाए रखता है।
खरना की खीर बनाने की विधि
परंपरानुसार, खीर मिट्टी के नए चूल्हे पर, आम की लकड़ी से आग जलाकर और पीतल के बर्तन में पकाई जाती है। यह प्रक्रिया व्रती और प्रसाद दोनों की पवित्रता और शुद्धता को सुनिश्चित करने के लिए की जाती है।
खरना के बाद के नियम और परंपराएँ
खरना का प्रसाद ग्रहण करने के बाद व्रती 36 घंटे तक निर्जला व्रत रखते हैं, जिसमें न तो पानी पीते हैं और न ही कुछ खाते हैं। यह कठोर व्रत श्रद्धा और भक्ति के साथ पूरा किया जाता है, जो छठ पूजा की विशेषता है।











