भैरव अष्टमी 2025 का महत्त्व और परंपराएँ
भैरव अष्टमी वर्ष 2025 में विशेष धार्मिक महत्त्व रखती है, जिसमें भक्तगण भगवान भैरव की पूजा अर्चना करते हैं। पंडित सलिल पांडेय जी के अनुसार, भैरव का स्वरूप भय का प्रतीक नहीं बल्कि अनुशासन और संतुलन का प्रतीक है। यह शक्ति अराजकता को नियंत्रित कर जीवन में स्थिरता और लय स्थापित करने का कार्य करती है। भैरव जी का यह स्वरूप करुणा और संरक्षण का भी प्रतीक माना जाता है, जो भक्तों को संकट और नकारात्मक ऊर्जा से मुक्ति दिलाता है।
भैरव जी का जन्म और उनका धार्मिक महत्व
शिव महापुराण के विद्येश्वर संहिता के आठवें अध्याय में वर्णित है कि जब ब्रह्मा जी के अहंकार और विष्णु जी के साथ विवाद के कारण सृष्टि संकट में फंस गई थी, तब महादेव के आज्ञाचक्र से तेजस्वी रूप प्रकट हुआ। इस तेजस्वी रूप को भैरव कहा गया, जिसने ब्रह्मा के अहंकार का अंत कर सृष्टि को प्रलय से बचाया। इसलिए पंडित जी का मानना है कि भैरव जी का कार्य संहार नहीं बल्कि लय और संतुलन बनाए रखना है।
भैरव राग की साधना और उसकी महत्ता
कहानी के अनुसार, ब्रह्महत्या के दोष से मुक्ति पाने के लिए भैरव जी काशी पहुंचे और संगीत साधना में लीन हो गए। इन्हीं से प्रेरित होकर भैरव राग, भैरवी, मेघ और मालकोस जैसे राग विकसित हुए। मान्यता है कि इन रागों का गायन भगवान शिव को प्रसन्न करता है, वहीं श्रीराग से देवी लक्ष्मी की कृपा मिलती है। संगीताचार्यों का कहना है कि ये राग न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करते हैं, बल्कि तनाव, अनिद्रा और अवसाद जैसी समस्याओं में भी राहत पहुंचाते हैं।









