वाराणसी के अन्नपूर्णा मंदिर में धनतेरस का विशेष आयोजन
वाराणसी के प्रसिद्ध मां अन्नपूर्णा मंदिर में हर वर्ष धनतेरस से अन्नकूट तक चार से पांच दिनों तक एक अनूठी परंपरा का पालन किया जाता है। इस दौरान मंदिर में आने वाले श्रद्धालुओं को विशेष रूप से अठन्नी और धान का लावा प्रसाद के रूप में दिया जाता है। माना जाता है कि इन वस्तुओं को घर या दुकान में रखने से सुख, समृद्धि और धन में वृद्धि होती है।
मंदिर का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व
देशभर में दीपावली के समय लक्ष्मी माता की पूजा की जाती है, लेकिन वाराणसी में स्थित मां अन्नपूर्णा देवी का मंदिर अपनी अलग परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर गंगा नदी के पश्चिमी घाट पर, काशी विश्वनाथ मंदिर के दक्षिण में स्थित है। मां अन्नपूर्णा को अन्न और धन की देवी माना जाता है, और उनके भक्त मानते हैं कि वे कभी भी किसी को भूखा नहीं रहने देतीं।
धनतेरस पर मिलते हैं सिक्के और धान के लावे का प्रसाद
धनतेरस के दिन से शुरू होकर अगले पांच दिनों तक मंदिर में विशेष खजाना वितरित किया जाता है। इसमें पुरानी अठन्नी और धान का लावा शामिल होता है, जो देखने में चांदी जैसी चमकदार प्रतीत होता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है, और अभी भी यह रहस्य बना हुआ है कि हर साल कितनी मात्रा में यह खजाना भक्तों में बांटा जाता है।
पौराणिक कथा और परंपरा का आधार
कहानी के अनुसार, काशी के राजा दिवोदास ने कभी देवी-देवताओं के शहर में प्रवेश पर रोक लगा दी थी। उस समय मां अन्नपूर्णा ने काशी में अकाल डालकर राजा के अहंकार को तोड़ा। इसके बाद काशी में अन्न की वर्षा हुई, और तभी से यह विशेष परंपरा शुरू हुई।
भक्तों की भारी भीड़ और धार्मिक आस्था
माना जाता है कि इस अठन्नी और धान के लावे को घर या व्यापारिक स्थान में रखने से गरीबी दूर रहती है और सुख-समृद्धि बनी रहती है। यही कारण है कि देशभर से श्रद्धालु इस खजाने को पाने के लिए मंदिर में लंबी कतारें लगाते हैं।
मां अन्नपूर्णा के स्वर्णिम दर्शन का अवसर
मां अन्नपूर्णा के दिव्य और स्वर्णिम स्वरूप के दर्शन केवल धनतेरस से अन्नकूट तक के चार-पांच दिनों के लिए ही संभव होते हैं। इस समय मंदिर परिसर में भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है, और वातावरण पूरी तरह से भक्तिमय हो जाता है।











