अहोई अष्टमी का महत्व और पूजा विधि
अहोई अष्टमी हिंदू धर्म का एक प्रमुख व्रत है, जो संतान की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और मंगलकामनाओं के लिए मनाया जाता है। यह व्रत कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को आयोजित किया जाता है। मान्यता है कि यदि श्रद्धा और भक्ति के साथ इस व्रत का पालन किया जाए, तो माता अहोई हर तरह की विपत्तियों से रक्षा करती हैं और संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद प्रदान करती हैं। इस दिन की पूजा में विशेष मंत्र का जाप किया जाता है, जो मनोकामनाओं को पूर्ण करने में सहायक होता है।
मंत्र और जप का महत्व
अहोई अष्टमी के दिन माता अहोई की पूजा के दौरान “ॐ पार्वतीप्रिय-नंदनाय नमः” मंत्र का जप किया जाता है। इस मंत्र का श्रद्धा और भक्ति के साथ जप करने से माता की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में सुख-शांति का वास होता है। भक्तगण इस मंत्र का 11 माला या 108 बार जप करते हैं, जिससे जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं और संतान से जुड़ी समस्याओं का समाधान होता है। इस विधि से मनोकामनाएं पूरी होने का विश्वास है।
पूजा का समय और आवश्यक सामग्री
अहोई माता की पूजा शाम के समय की जाती है, जब तारों के उदय होने का समय होता है। इस समय महिलाएं कथा सुनकर तारों को जल अर्पित करती हैं। पूजा में माता की तस्वीर या आकृति, सूत, जल का कलश, सात अनाज, फल, मिठाई और तारों देखने के लिए थाली का प्रयोग किया जाता है। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की रक्षा, परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनाए रखना है।











