मुंबई में कबूतरखाने बंद करने का विवाद और जैन मुनि का अनशन
मुंबई के दादर इलाके में स्थित प्रसिद्ध कबूतरखाने को बंद करने के निर्णय के खिलाफ जैन मुनि निलेशचंद्र विजय ने आज़ाद मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल शुरू कर दी है। उन्होंने इस कदम को धार्मिक आस्था पर हमला बताते हुए कहा कि यह कबूतरखाना सदियों पुरानी सांस्कृतिक धरोहर है। मुनि ने जलत्याग का संकल्प भी लिया है, जो इस मुद्दे की गंभीरता को दर्शाता है।
बीएमसी का कदम और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं
मई-जुलाई के बीच बीएमसी ने मुंबई के 51 कबूतरखानों को बंद कर दिया था, जिसमें दादर भी शामिल है। इसका मुख्य कारण था – कबूतरों से फैलने वाली श्वसन रोगें और आसपास के निवासियों में फेफड़ों से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याएं। बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस मामले में संज्ञान लेते हुए विशेषज्ञों की समिति बनाने का आदेश दिया, जिसमें ICMR (Indian Council of Medical Research), AIIMS (All India Institute of Medical Sciences) और राज्य के स्वास्थ्य अधिकारी शामिल हैं। यह समिति यह अध्ययन करेगी कि कबूतरों का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।
धार्मिक भावना और समुदाय का विरोध
जैन मुनि ने दादर के कबूतरखाने को “सदी पुरानी धार्मिक धरोहर” करार देते हुए कहा कि यह केवल पक्षियों का घर नहीं, बल्कि शांति और करुणा का प्रतीक है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कबूतरखाना सौ साल से अधिक पुराना है और यह जैन परंपरा का अभिन्न हिस्सा है। उनका तर्क है कि इसे बंद करना जीवों की हत्या के समान है। मुनि ने दावा किया कि कबूतरखाने के बंद होने के बाद से एक लाख से अधिक कबूतरों की मौत हो चुकी है, और वर्तमान में रोजाना 50 से 60 घायल या बीमार कबूतरों का इलाज किया जा रहा है।
विकल्प स्थल और विरोध प्रदर्शन
बीएमसी ने नियंत्रित भोजन व्यवस्था के तहत चार नई जगहें तय की हैं – वर्ली जलाशय, अंधेरी मैंग्रोव क्षेत्र, ऐरोली-मुलुंड चेकपोस्ट और बोरीवली का गोरेगांव ग्राउंड। इन स्थानों पर सुबह 7 से 9 बजे तक कबूतरों को दाना डालने की अनुमति दी गई है। लेकिन जैन मुनि निलेशचंद्र विजय ने इन स्थानों को अस्वीकार कर दिया है, क्योंकि ये दादर से चार से नौ किलोमीटर दूर हैं। उनका सवाल है कि क्या कबूतर इतनी दूर उड़कर जाएंगे।
राजनीतिक तुलना और समाज की प्रतिक्रिया
मुनि ने सवाल उठाया कि यदि मराठा आरक्षण आंदोलन के नेता मनोज जरांगे को आज़ाद मैदान में प्रदर्शन की अनुमति मिल सकती है, तो फिर पक्षी संरक्षण के लिए आंदोलन क्यों नहीं किया जा सकता? उन्होंने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे से हस्तक्षेप करने का आग्रह किया और पूरे जैन समाज से मुंबई पहुंचकर इस आंदोलन में भाग लेने का आह्वान किया।
स्थानीय लोगों और समुदाय का मतभेद
कुछ स्थानीय निवासी बीएमसी के फैसले का समर्थन करते हैं, उनका तर्क है कि कबूतरों की बीट से फेफड़ों की बीमारियां फैल रही हैं और बच्चों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। वहीं, जैन समुदाय और पशु-प्रेमी संगठनों का मानना है कि मानव की सुविधा के लिए जीवों को मरने नहीं दिया जाना चाहिए। इस विवाद में समाज के विभिन्न वर्गों की राय विभाजित नजर आ रही है।











