गौरैया संरक्षण के लिए नई पहल और प्रयास
आज के समय में गौरैया चिड़ियों की आवाज़ सुनना बहुत कम हो गया है, और ये फुदकती हुई छोटी पक्षी अब किसी भी आंगन में दिखाई नहीं देतीं। इसका मुख्य कारण है कि पहले की तुलना में मौसम की मार और पर्यावरणीय बदलावों ने इनकी संख्या को काफी कम कर दिया है। अब ये पक्षी बहुत ही दुर्लभ हो गई हैं, और जब भी कभी दिखाई देती हैं, तो बुजुर्गों के चेहरे पर खुशी और आशा की किरण जाग जाती है।
गौरैया को बचाने के लिए कई सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन धरातल पर इन प्रयासों का प्रभाव बहुत सीमित रहा है। उम्मीद है कि इस बार गर्मी के मौसम में गौरैयों को जो कठिनाइयां होती थीं, उनसे कुछ राहत मिलेगी। समाजसेवी रितेश अग्रवाल नापानेरा ने गौरैया संरक्षण के लिए 5000 से अधिक घोंसले तैयार कराए हैं, जिनका वितरण पूरे जिले में किया जा रहा है।
गौरैया संरक्षण में समाज का सक्रिय योगदान
रितेश अग्रवाल ने बताया कि इन घोंसलों का निर्माण बाबा महाकाल (Mahakal) की प्रेरणा से किया गया है, और इन आशियानों में महाकाल बाबा का रक्षा सूत्र भी बंधा हुआ है। यह रक्षा सूत्र विपत्तियों के समय भी गौरैयों की सुरक्षा सुनिश्चित करेगा। उनके परिवार का मानना है कि इन प्रयासों से गौरैया फिर से वातावरण में लौटेंगी और चीं-चीं की आवाज़ से पूरे क्षेत्र का माहौल खुशहाल हो जाएगा।
उनकी पत्नी अंजना ने कहा कि महाकाल और महालक्ष्मी (Mahalaxmi) की प्रेरणा से यह अभियान चलाया जा रहा है। मंदिर से शुरू हुए इस वितरण कार्यक्रम का उद्देश्य है कि गौरैया फिर से अपने प्राकृतिक आवास में फुदकें और अपने गीतों से वातावरण को जीवंत बनाएं। राघव अग्रवाल ने बताया कि इन घोंसलों को घर-घर तक पहुंचाया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक लोग पक्षियों के संरक्षण में भागीदारी करें।
गौरैया संरक्षण के लिए सरकारी और सामाजिक प्रयास
छत्तीसगढ़ के उपमुख्यमंत्री अरुण साव (Arun Sawa) ने भी इस अभियान का समर्थन किया है और आशियाने वितरित किए हैं। महेश अग्रवाल ने रितेश नापानेरा के इस प्रयास की प्रशंसा की और कहा कि यदि अभी भी प्रयास नहीं किए गए, तो गौरैया पूरी तरह से लुप्त हो सकती हैं। पार्षद ज्ञानू विजय ने भी इस पहल को सराहते हुए कहा कि यह प्रयास बहुत ही सुंदर है और इससे गर्मी के मौसम में पक्षियों को राहत मिलेगी।
वरिष्ठ पत्रकार गोपाल राही ने कहा कि गौरैया संरक्षण के लिए रितेश नापानेरा का प्रयास प्रशंसनीय है। इन घोंसलों का प्रभाव अगले साल दिखेगा, जब गौरैया फिर से चहचहाती नजर आएंगी। यदि संभव हो, तो प्रजनन केंद्र भी बनाकर इन पक्षियों का संरक्षण किया जाना चाहिए, ताकि वे लुप्त होने से बच सकें।









