मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का फैसला: आर्मी ऑफिसर के खिलाफ FIR रद्द
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक आर्मी अधिकारी के खिलाफ दर्ज हुई रेप की प्राथमिकी को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। यह मामला एक महिला पुलिसकर्मी द्वारा दर्ज कराया गया था, जिसमें आरोप था कि अधिकारी ने शादी का झांसा देकर उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए। लेकिन जस्टिस विनय सर्राफ की एकल पीठ ने इस मामले को आपसी सहमति का बताया और इसे अपराध नहीं माना।
संबंधों का इतिहास और कोर्ट का निर्णय
अदालत ने अपने 11 मार्च के आदेश में बताया कि शिकायतकर्ता महिला पुलिसकर्मी और आरोपी आर्मी अधिकारी के बीच वर्ष 2012 से संबंध थे। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब दोनों के बीच संबंधों में खटास आई, तब शिकायतकर्ता ने दबाव बनाने के लिए यह FIR दर्ज कराई। कोर्ट ने यह भी कहा कि दोनों के बीच संबंध स्वेच्छा से थे, और यह शादी का झांसा देकर बनाए गए संबंध नहीं थे।
संबंधों का विस्तार और न्यायिक निर्णय का आधार
साल 2012 में भोपाल की आर्मी कैंटीन में दोनों की पहली मुलाकात हुई और मोबाइल पर बातचीत शुरू हुई। महिला का आरोप था कि अधिकारी ने खुद को कुंवारा बताया, लेकिन 2013 में पता चला कि वह शादीशुदा है। इसके बावजूद दोनों का संबंध 2025 तक चलता रहा, जिसमें अधिकारी ने शादी का भरोसा दिलाया था। 2025 में महिला को पता चला कि अधिकारी अन्य महिलाओं के संपर्क में भी था, जिसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा।
हाई कोर्ट ने कहा कि 13 वर्षों तक चले इस संबंध को देखते हुए यह मानना संभव नहीं कि यह केवल शादी के झूठे वादे पर आधारित था। कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 69 और 351(2) के तहत कोई सबूत न मिलने का हवाला देते हुए कहा कि यह मामला कानून का दुरुपयोग है। इस निर्णय के साथ ही कोर्ट ने आरोपी अधिकारी की याचिका स्वीकार कर ली।










