मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में मनरेगा भ्रष्टाचार का मामला उजागर
मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले में मनरेगा योजना के तहत करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी का मामला अब व्यापक चर्चा का विषय बन चुका है। इस संदर्भ में हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने गंभीरता को देखते हुए लोकायुक्त पुलिस को जांच के आदेश दिए हैं। साथ ही, जिला पंचायत के मुख्य कार्यपालन अधिकारी ने इस मामले की जांच के लिए एक विशेष टीम का गठन किया है।
मनरेगा में भ्रष्टाचार की बढ़ती घटनाएं और हाईकोर्ट का हस्तक्षेप
मनरेगा योजना लगातार मीडिया और जनता के बीच चर्चा का केंद्र बनी हुई है। योजना का नाम बदलने से लेकर ऑडिट रिपोर्ट में भ्रष्टाचार की पुष्टि होने तक, हर दिन नई खबरें सामने आ रही हैं। 2020 में झाबुआ जिले में हुए भ्रष्टाचार के कई आरोपों के बावजूद जब कोई कार्रवाई नहीं हुई, तो यह मामला हाईकोर्ट पहुंच गया। हाईकोर्ट ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए लोकायुक्त पुलिस को जांच का आदेश दिया है।
रानापुर ब्लॉक के थुवादरा गांव में खुलासा और फर्जीवाड़े का पर्दाफाश
सबसे चौंकाने वाली तस्वीर रानापुर ब्लॉक के थुवादरा गांव से सामने आई है। मृतक सकरिया के पुत्र लालू डामोर ने अपने पिता का मृत्यु प्रमाण पत्र दिखाते हुए बताया कि उनके पिता की मृत्यु 2017 में हो चुकी है। उनका आरोप है कि 2020 में मनरेगा के तहत करोड़ों रुपये का तालाब निर्माण किया गया, जबकि उनके पिता की मौत तीन साल पहले ही हो चुकी थी। लालू का कहना है कि उनके पिता के जॉब कार्ड (MP 21 012 032 001 139) का इस्तेमाल कर फर्जीवाड़ा किया गया है।
लालू ने यह भी बताया कि मई से जुलाई 2020 के बीच सकरिया के नाम पर तीन अलग-अलग किस्तों में राशि का आहरण किया गया, जबकि उनके पिता की मृत्यु तीन साल पहले ही हो चुकी थी। इसके अलावा, जीवित मजदूरों के साथ भी धोखाधड़ी हुई है। आदिवासी मजदूर तरूबाई ने बताया कि उन्होंने कभी तालाब निर्माण में काम नहीं किया, लेकिन उनके नाम का उपयोग कर राशि निकाल ली गई। ऐसे ही दर्जनों मजदूर हैं जिन्हें इस धोखाधड़ी का पता तक नहीं है।
हाईकोर्ट ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाते हुए कहा है कि झाबुआ जिले के चार विकासखंडों में करोड़ों रुपये के भ्रष्टाचार की जांच होनी चाहिए। आदिवासी विकास परिषद के जिला अध्यक्ष मथियास भूरिया ने आरोप लगाया है कि वह शिकायतें करते-करते थक गए हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। मजबूर होकर उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां अदालत ने अधिकारियों को जांच के आदेश दिए। फिर भी, जांच प्रक्रिया में देरी होने पर हाईकोर्ट ने लोकायुक्त पुलिस को जांच का निर्देश दिया है।
जिला पंचायत ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए तुरंत ही एक विशेष जांच दल का गठन किया है। यह दल उन पंचायतों का रिकॉर्ड खंगालेगा, जहां 2020 में फर्जी मस्टर रोल के जरिए करोड़ों रुपये का आहरण किया गया है।










