खदानों में काम करने वाले पुरुषों की उम्र सीमा और सिलिकोसिस का खतरा
पैंतीस से पैंतालीस वर्ष की उम्र के बीच खदानों में कार्यरत पुरुष अक्सर इस उम्र तक पहुंचते हैं। इसका मुख्य कारण सिलिकोसिस नामक गंभीर फेफड़ों की बीमारी है। खदानों में काम के दौरान सांस के जरिए धूल फेफड़ों में पहुंच जाती है, जिससे सिलिका डस्ट जम जाती है। इससे फेफड़े कठोर हो जाते हैं, जैसे पत्थर। इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति को सांस लेने में कठिनाई होती है, और कुछ ही कदम चलना भी उसके लिए भारी हो जाता है। अंततः, तेज बुखार, थकान और खून की उल्टियां शुरू हो जाती हैं, और मौत हो जाती है। यह बीमारी अत्यंत जटिल और लाइलाज है, जिसे महंगे उपचार से ही नियंत्रित किया जा सकता है, वह भी अस्थायी रूप से।
मनौर में सिलिकोसिस से प्रभावित मजदूरों का जीवन और स्वास्थ्य संकट
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, मनौर (Manor) के तीन मोहल्लों में लगभग एक हजार लोग रहते हैं। इनमें से अधिकांश आदिवासी समुदाय के हैं, जो मुख्य रूप से स्टोन माइन्स (Stone Mines) में काम करते हैं। इन मजदूरों में से करीब 70 महिलाएं विधवा हैं, और कई महिलाएं बाहर जाकर मजदूरी कर रही हैं। इन महिलाओं का जीवन बहुत कठिन है, खासकर उन महिलाओं का जो सिलिकोसिस से पीड़ित हैं। इन महिलाओं का कहना है कि उनके पति 40 साल की उम्र तक ही जीवित रहते हैं, उसके बाद उनकी मौत हो जाती है। इन महिलाओं का जीवन मजदूरी, बच्चों की देखभाल और बीमारी के साथ जूझते हुए गुजरता है।
बच्चों और महिलाओं का जीवन और खदानों का धीरे-धीरे बंद होना
इन महिलाओं का कहना है कि उनके पति पत्थर खदानों में काम करते-करते बीमार हो जाते हैं। अब खदानें धीरे-धीरे बंद हो रही हैं, क्योंकि पर्यावरणीय नियमों के कारण कई खदानों का रिन्यूअल नहीं हो पा रहा है। कई खदानें अवैध हैं, और कुछ को टाइगर रिजर्व की सीमा में आने के कारण बंद कर दिया गया है। इन खदानों के बंद होने के बावजूद, पहले ही बहुत नुकसान हो चुका है। इन महिलाओं और उनके बच्चों का जीवन बहुत संघर्षपूर्ण है। वे मजदूरी के लिए बाहर जाती हैं या फिर बड़े शहरों में काम करने चली जाती हैं। जिन महिलाओं की उम्र कम है, वे दिल्ली जैसे शहरों में जाकर काम करती हैं, जबकि जो पहले ही अपने पति को खो चुकी हैं, वे अभी भी गांव में रहती हैं।











