मध्य प्रदेश में वक्फ संपत्तियों का पंजीकरण विवाद
मध्य प्रदेश में वक्फ संपत्तियों के पंजीकरण को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने चौंकाने वाले खुलासे किए हैं, जिनसे राज्य की जमीनों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2018 से 2023 के बीच, 20 जिलों में लगभग 77 करोड़ रुपये की सरकारी जमीन को नियमों को अनदेखा कर वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज किया गया है।
सरकारी जमीन का अनियमित वक्फ में पंजीकरण
जांच में पाया गया कि इन 81 संपत्तियों में से 33 यानी करीब 41 प्रतिशत जमीनें असल में सरकारी थीं। इनमें स्कूल, पुलिस थाने, वन भूमि और यहां तक कि बैंक में गिरवी रखी गई जमीन भी शामिल है। ये जमीनें पहले राजस्व रिकॉर्ड में सरकार के नाम दर्ज थीं और सामान्यतः सामुदायिक उपयोग के लिए आरक्षित थीं, लेकिन बाद में इन्हें वक्फ के नाम पर पंजीकृत कर दिया गया।
भोपाल की मस्जिद और मिसरोद का मामला
उदाहरण के तौर पर भोपाल के संजय नगर की मस्जिद का मामला सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, 1994 में इस भूमि को 30 वर्षों के पट्टे पर एक पट्टेदार को हस्तांतरित किया गया था, जिसमें स्पष्ट शर्तें थीं कि भूमि का स्वामित्व शासन के पास रहेगा और इसका उपयोग धार्मिक कार्यों के लिए ही किया जाएगा। फिर भी, 2021 में इस भूमि को वक्फ के रूप में पंजीकृत कर दिया गया, जबकि पट्टे की शर्तों का उल्लंघन हुआ। इसी तरह, मिसरोद इलाके में 3600 वर्ग मीटर जमीन को कब्रिस्तान बताकर वक्फ में शामिल किया गया, जबकि उस पर शासकीय विद्यालय और थाना मौजूद हैं।
इन मामलों के अलावा, विदिशा, सीहोर और धार जैसे जिलों में भी सरकारी वन भूमि, कब्रिस्तान और मदरसे जैसी संपत्तियों का अनियमित पंजीकरण हुआ है। इन सभी मामलों में जांच के आदेश दिए गए हैं, और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की तैयारी है।
राजस्व मंत्री ने कहा है कि सरकारी जमीन पर अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, और दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जाएंगे। वहीं, वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी की संपत्ति पर कब्जा करना नहीं है, बल्कि रिपोर्ट की जांच कर उचित कार्रवाई की जाएगी।
विपक्षी दल ने इस मामले में सरकार पर मिलीभगत का आरोप लगाते हुए कहा है कि जब प्रदेश में भाजपा की सरकार थी, तब इतनी बड़ी गड़बड़ी कैसे हुई। अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या इन जमीनों का मूल स्वरूप बहाल किया जाएगा और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई होगी। इस पूरे विवाद ने प्रशासनिक जवाबदेही और सरकारी जमीनों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।











