छिंदवाड़ा में जहरीली दवाओं का कहर: कुणाल की दर्दनाक कहानी
छिंदवाड़ा जिले में जहरीले कफ सिरप के कारण हुई बच्चों की मौतों का सिलसिला अभी थमा नहीं है, लेकिन इस बीच एक 5 वर्षीय बच्चे की जंग जीतने की कहानी पूरे जिले में चर्चा का विषय बन गई है। कुणाल यदुवंशी, जो कि जहरीली दवा के कारण अपनी आंखों की रोशनी खो चुका है, आखिरकार अपने घर लौट आया है। हालांकि, उसकी वापसी के साथ ही एक दुखद सच्चाई भी सामने आई है कि उसकी आंखें अब नहीं देख सकतीं। मामूली बुखार के इलाज में दी गई दवा ने उसकी जिंदगी को पूरी तरह बदल कर रख दिया है।
सिस्टम की लापरवाही और जहरीली दवाओं का असर
यह कहानी केवल कुणाल की नहीं है, बल्कि उस लापरवाह स्वास्थ्य व्यवस्था की भी है, जिसने कई परिवारों को दुखों का सामना करने पर मजबूर कर दिया है। जहरीली दवाओं ने न केवल बच्चों की जिंदगी छीन ली है, बल्कि उनके परिवारों को भी गहरे सदमे में डाल दिया है। छिंदवाड़ा में जहरीले कफ सिरप के कारण अब तक 22 बच्चों की मौत हो चुकी है, और इस मामले में SIT ने 10 आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया है। जांच अभी भी जारी है, ताकि दोषियों को सजा मिल सके।
कुणाल का दर्दनाक सफर और परिवार का संघर्ष
परासिया विकासखंड के ग्राम जाटाछापर निवासी टिंकू यदुवंशी के बेटे कुणाल को 24 अगस्त को बुखार आया था। परिजन उसे परासिया के डॉक्टर प्रवीण सोनी के पास ले गए, जहां उसे कोल्ड्रिफ कफ सिरप दी गई। इसके बाद उसकी हालत तेजी से बिगड़ने लगी। बुखार के साथ उल्टियां और पेट फूलना शुरू हो गया। 27 अगस्त को फिर से डॉक्टर को दिखाया गया, लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ। 30 अगस्त को छिंदवाड़ा में डॉक्टर नाहर ने जांच के बाद बताया कि कुणाल की किडनी खराब हो चुकी है और उसे तुरंत नागपुर ले जाना जरूरी है।
नागपुर के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराए गए कुणाल का इलाज 11-12 दिनों तक चला, जिसमें उसे कई बार डायलिसिस करानी पड़ी। इलाज का खर्च बढ़ता गया और परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। मजबूरी में 11 सितंबर को कुणाल को नागपुर के एम्स अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां लगभग साढ़े तीन महीने तक इलाज चला। 23 दिसंबर को उसे अस्पताल से छुट्टी मिली, लेकिन उसकी स्थिति अभी भी पूरी तरह ठीक नहीं है।
डॉक्टरों के अनुसार, जहरीले कफ सिरप का असर बच्चे के दिमाग पर पड़ा है। ब्रेन में अटैक के कारण उसकी आंखों की नसें सिकुड़ गईं और आंखों का पानी सूख गया, जिससे उसकी दृष्टि चली गई। साथ ही पैरों की नसों में भी अभी समस्या बनी हुई है। परिवार ने इलाज के दौरान भारी आर्थिक संकट का सामना किया। रिश्तेदारों से कर्ज लिया गया, जेवर बेचे गए और यहां तक कि दो भैंस भी बेचनी पड़ीं। इस पूरे संघर्ष में करीब 8 लाख रुपये खर्च हुए, जिनमें से सरकार की सहायता राशि 4 लाख 25 हजार रुपये मिली।
हालांकि, कुणाल के घर लौटने से गांव में खुशी का माहौल है, लेकिन पिता का कहना है कि यदि उसकी आंखें वापस आ जातीं तो यह खुशी और भी बढ़ जाती। उन्होंने बेटे के पूरी तरह स्वस्थ होने पर गांव के शिव मंदिर में भंडारे का आयोजन करने का संकल्प लिया था, जो अभी तक पूरा नहीं हो पाया है।











