प्रधानमंत्री आवास योजना की वर्तमान स्थिति और चुनौतियां
देश के हर गरीब को स्थायी आवास प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) आज भी कई इलाकों में अपनी मंजिल से दूर नजर आ रही है। वर्ष 2015 में शुरू हुई इस महत्वाकांक्षी योजना को गरीबों के जीवन में सुधार लाने का एक बड़ा कदम माना गया था, लेकिन हकीकत में कई शहरों में यह योजना अपने ही मकसद से पीछे हट चुकी है। भोपाल जैसे शहर में भी हजारों गरीब परिवार आज भी अपने सपनों के घर की चाबी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं।
स्थानीय निकायों की भूमिका और योजना की बाधाएं
यदि प्रधानमंत्री आवास योजना अभी भी कई स्थानों पर अधर में लटकी हुई है, तो उसकी मुख्य वजह है स्थानीय निकायों की भूमिका। केंद्र और राज्य सरकार के संयुक्त प्रयास से बनने वाले EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग) और हाउसिंग फोर ऑल कैटेगरी के मकानों के निर्माण में नगर निगम को भी 10 प्रतिशत वित्तीय योगदान देना था। परंतु, नगर निगम इस वित्तीय हिस्सेदारी को पूरा नहीं कर सका, जिसके कारण योजना के आधे से अधिक मकान अभी भी अधूरे पड़े हैं। इस कारण गरीबों का सपना पूरा होने का इंतजार लंबा होता जा रहा है।
आवास योजना की हकीकत और गरीबों का संघर्ष
सबसे दुखद बात यह है कि जिन्होंने समय पर पंजीकरण कराया, दस्तावेज पूरे किए और यहां तक कि होम लोन भी ले लिया, उन्हें आज तक अपने घर की चाबी नहीं मिल सकी है। अधूरे मकान खामोशी से खड़े हैं, जिनमें न तो छत पूरी है और न ही भविष्य का कोई निश्चित समय तय हो पाया है। भोपाल की झुग्गी बस्तियों में जब AajTak की टीम ने दौरा किया, तो स्थिति बेहद चिंताजनक मिली। कई परिवारों ने बेहतर जीवन के सपने के साथ फ्लैट के लिए आवेदन किया था, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी उन्हें कुछ नहीं मिला।
सांई बोर्ड के पास रहने वाले चोखेलाल जैसे गरीबों का दर्द इस योजना की हकीकत को बयां करता है। उन्होंने सात साल पहले बीस हजार रुपए जमा कर EWS फ्लैट के लिए पंजीकरण कराया था, लेकिन आज तक उन्हें न तो कोई आवंटन पत्र मिला और न ही उनके सपनों का घर पूरा हुआ। इसी तरह नासिर खान भी तीन साल पहले होम लोन लेकर मकान आवंटित होने के बावजूद अभी तक मकान का निर्माण पूरा नहीं हो पाया है।
यह कहानी केवल चोखेलाल या नासिर की नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों की है, जो उम्मीद के साथ इस योजना से जुड़े थे, लेकिन अब निराशा ही उनके जीवन का हिस्सा बन चुकी है। सवाल यह है कि जब योजनाएं बनती हैं, बजट तय होते हैं और लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं, तो फिर गरीबों को उनका हक क्यों नहीं मिल पाता? क्या यह प्रशासनिक लापरवाही है या फिर गरीबों के सपनों को प्राथमिकता न देने का परिणाम?
हालांकि, कुछ भाग्यशाली लोग हैं जिन्होंने अपने आवास प्राप्त कर लिया है। भोपाल के गोविंदपुरा झुग्गियों में रहने वाली श्रुति करण जैसी महिलाएं अब भानपुर के पास बने EWS फ्लैट में शिफ्ट हो चुकी हैं। उनके पास अब सारी सुविधाएं हैं, जो कभी झुग्गियों में रहकर कल्पना भी नहीं कर सकती थीं। चमकदार टाइल्स, बालकनी, हवा का प्रवाह, लिफ्ट, साफ पानी और सोसायटी का सुरक्षा प्रबंध-यह सब उनके जीवन में बदलाव का प्रतीक है।
भोपाल में अब तक कुल 7589 आवास स्वीकृत हुए हैं, जिनमें से 2720 मकान बनकर तैयार हैं। इनमें से 1938 आवासों का आवंटन भी हो चुका है, जबकि अभी भी 782 मकान रिक्त पड़े हैं। यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि योजना के क्रियान्वयन में अभी भी कई चुनौतियां हैं, जिन पर ध्यान देना जरूरी है।











