धामी गांव में सदियों पुराना पत्थरबाजी का मेला
हिमाचल प्रदेश के शिमला के पास स्थित धामी गांव में हर साल की तरह इस बार भी प्राचीन परंपरा का उत्साहपूर्वक आयोजन किया गया। यह अनूठा मेला दिवाली के अगले दिन मनाया जाता है, जिसमें दो पड़ोसी गांवों के लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। इस परंपरा का मुख्य उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि देवी मां के प्रति श्रद्धा और साहस का प्रदर्शन है।
मेला कैसे शुरू होता है और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मेला शुरू होने का तरीका बहुत ही खास है। नरसिंह देवता मंदिर के पुजारी ढोल-नगाड़ों के साथ काली देवी मंदिर पहुंचते हैं, जिसके बाद पत्थर फेंकने का सिलसिला शुरू हो जाता है। इस प्रथा की शुरुआत लगभग तीन सौ साल पहले मानी जाती है, जब इसे सती प्रथा के विकल्प के रूप में स्थापित किया गया था। इस परंपरा का उद्देश्य सामाजिक और धार्मिक मान्यताओं को मजबूत करना है।
प्रशासनिक प्रयासों के बावजूद परंपरा का जारी रहना
स्थानीय प्रशासन और मानवाधिकार संगठनों ने इस परंपरा को रोकने का प्रयास किया है, क्योंकि इसमें चोट लगने का खतरा रहता है। बावजूद इसके, धामी के ग्रामीण अपनी धार्मिक आस्था और परंपराओं से पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। उनका मानना है कि यह मेला केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि देवी मां के प्रति श्रद्धा और साहस का प्रतीक है। इस साल पत्थरबाजी लगभग आधे घंटे तक चली, जबकि पिछले साल यह केवल 15 मिनट में समाप्त हो गई थी।











