नई दिल्ली के विश्व पुस्तक मेले में संजना तिवारी का अनूठा स्टॉल
प्रगति मैदान में चल रहे विश्व पुस्तक मेले में कई प्रसिद्ध प्रकाशकों और आकर्षक स्टॉल्स के बीच एक छोटा सा स्टॉल अपनी सादगी और विशिष्टता के कारण लोगों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। यह स्टॉल किसी बड़े ब्रांड का नहीं, बल्कि उस महिला का है, जिसने अपने जीवन का अधिकांश समय किताबों को समर्पित कर दिया है। उनका नाम है संजना तिवारी, जिन्हें दिल्ली के मंडी हाउस क्षेत्र में प्यार से ‘किताब वाली आंटी’ कहा जाता है।
सजना तिवारी का सादा लेकिन प्रभावशाली स्टॉल
जहां विश्व पुस्तक मेले में भारी-भरकम किताबें और आकर्षक ऑफर्स दर्शकों को आकर्षित कर रहे हैं, वहीं संजना तिवारी का यह सरल सा स्टॉल अपनी अलग पहचान बना रहा है। यहां आने वाले पाठक न केवल किताबें खरीदते हैं, बल्कि वर्षों का अनुभव और आत्मीयता भी महसूस करते हैं। यह स्टॉल अपने अनूठे अंदाज और साहित्यिक प्रेम के कारण लोगों के बीच खास स्थान बना चुका है।
मंडी हाउस से विश्व पुस्तक मेले तक का सफर और संजना तिवारी का जीवन
लगभग ढाई दशक से संजना तिवारी दिल्ली के मंडी हाउस में एक पेड़ के नीचे हिंदी साहित्य की दुकान सजाती आ रही हैं। उनका यह स्थान थिएटर कलाकारों, कवियों और लेखकों के बीच साहित्य का एक प्रसिद्ध केंद्र बन चुका है। आज वे विश्व पुस्तक मेले में अपनी मौजूदगी दर्ज करा रही हैं। संजना का जन्म बिहार के सीवान जिले में हुआ था। शादी के समय वे केवल हाईस्कूल पास थीं, लेकिन उनके जीवन का सफर प्रेरणादायक रहा है।
उनके परिवार में आर्थिक स्थिति मजबूत है। उनके पति रिटायर्ड पत्रकार और लेखक हैं, उनका बेटा डॉक्टर है, बेटी पीएचडी कर रही है और दामाद आईपीएस अधिकारी हैं। इसके बावजूद, संजना आज भी अपनी किताबों की दुकान संभालती हैं। उनका मानना है कि यह काम उनके लिए कोई मजबूरी नहीं, बल्कि आत्मिक संतोष का स्रोत है। उनके लिए किताबें सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं।
संजना का परिवार सिर्फ घर तक सीमित नहीं है, बल्कि मंडी हाउस के थिएटर कलाकार, लेखक, कवि और पाठक भी उनके अपने हैं। कई युवा, जो कभी उनकी दुकान से किताबें खरीदते थे, आज आईएएस और आईपीएस बन चुके हैं और उनसे आशीर्वाद लेने आते हैं। संजना का मानना है कि साहित्य समाज को बेहतर बनाता है और नई पीढ़ी को किताबों से जोड़ना ही उनका सबसे बड़ा सपना है।











