भारत में गैस संकट का असर और जनता का संघर्ष
ईरान-अमेरिका और इजरायल के बीच चल रही जंग के बीस दिन पूरे हो चुके हैं, और इस तनाव के बीच भारत में रसोई गैस की आपूर्ति को लेकर बेचैनी बढ़ती जा रही है। गैस एजेंसियों पर ग्राहकों की भीड़ लगातार बढ़ रही है, जिससे स्थिति और भी जटिल हो गई है। ऐसे में हमने सोचा कि गैस गोदाम का हकीकत का जायजा लिया जाए। घर से लगभग ढाई किलोमीटर दूर स्थित इस गोदाम का रास्ता खुद कहानी कह रहा था।
रास्ते में कई लोग सिलेंडर लेकर चल रहे थे। कोई बाइक पर सिलेंडर लादे जा रहा था, तो कोई बैटरी रिक्शा में खाली सिलेंडर टिकाए बैठा था। वहीं, कुछ लोग साइकिल पर रस्सी से बांधकर सिलेंडर ले जा रहे थे। असल में, सिस्टम सरल है। आपने सिलेंडर बुक किया, फिर आपको DAC नंबर मिला, और दो-तीन दिनों में सिलेंडर आपके घर पहुंच जाना चाहिए था। लेकिन हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है। एजेंसियों की अपनी परेशानियां हैं और ग्राहकों का सब्र भी जवाब दे रहा है।
लोगों का धैर्य जवाब देने लगा, लंबी कतारें और हंगामा
नतीजा यह हुआ कि लोग बुकिंग के बाद इंतजार करने के बजाय खुद ही खाली सिलेंडर लेकर एजेंसी पहुंच रहे हैं। एक ही बात हो रही है—”लो मेरा खाली सिलेंडर, भरा हुआ दे दो।” इस तरह की मांग के कारण एजेंसियां भी असहाय हो रही हैं। स्टॉक न होने का बहाना बनाकर लोगों को सीधे गोदाम का रास्ता दिखाया जाता है। फिर वही सिलेंडर, वही लोग और बाहर लंबी कतारें।
शास्त्री पार्क के इस गोदाम में भीड़ में खड़े लोग खाली सिलेंडर भी लेकर कतार में थे। कोई उन्हें खींचकर आगे बढ़ा रहा था, तो कोई हाथ-पैर मारकर। धीरे-धीरे कतार खिसक रही थी, और लोग भी अपने धैर्य को खोते जा रहे थे। तभी एक व्यक्ति कंधे पर भरा हुआ सिलेंडर लेकर निकला, चेहरे पर हल्की मुस्कान के साथ। उसने कहा, “भाई, तीन दिन से लाइन में लगा था, अब जाकर मिला है।” उसके पीछे एक और व्यक्ति निकला और बोला, “सुबह छह बजे आया था, आखिरकार मुझे भी सिलेंडर मिल गया।” इस तरह, लोगों का सब्र जवाब देने लगा और शिकायतों का सिलसिला शुरू हो गया।
सिलेंडर की कीमत और ब्लैक मार्केट का खेल
गिरधारी लाल ने बताया कि होली पर वह अपने गांव कोटपूतली गए थे। अब दिल्ली लौटे हैं और घर का सिलेंडर खाली है। बुकिंग कराई तो एजेंसी ने सीधे कह दिया, “गोदाम से ले आओ।” तभी से वह लाइन में हैं। उन्होंने कहा, “सुबह से खड़ा हूं, घर पर लकड़ी के चूल्हे से काम चला रहा हूं।” वहीं, असलम का गुस्सा अलग था। उन्होंने बताया कि 5 मार्च को पुराने रेट (₹853) में सिलेंडर बुक किया था, लेकिन बाद में एजेंसी ने कहा कि पुराना स्टॉक खत्म हो गया है और ₹60 अधिक देने पड़े। यानी, बुकिंग पुराने दाम पर हुई, लेकिन सिलेंडर नए रेट का ही मिलेगा।
बात यह भी है कि सिलेंडर कब मिलेगा, इसकी कोई निश्चित गारंटी नहीं है। बुजुर्ग फौजिया भी अपने खाली सिलेंडर पर बैठी थीं और बोलीं, “2 मार्च को बुक किया था, लेकिन अभी तक नहीं आया। आखिरकार खुद ही लेना पड़ा।” लाइन में खड़े हर चेहरे पर इंतजार और झुंझलाहट साफ नजर आ रही थी।
इसी बीच, गोदाम पर हंगामा हो गया। पता चला कि एक व्यक्ति खुद सिलेंडर लेकर नहीं आया था, बल्कि उसका साथी अचानक पहुंचा और लाइन तोड़कर अपना सिलेंडर फिट करने लगा। आसपास खड़े लोग भड़क गए। बहस बढ़ी तो उस व्यक्ति ने कहा, “मैंने 700 रुपये दिहाड़ी पर इसे लाइन में खड़ा किया है।” फिर, माहौल थोड़ी देर के लिए शांत हुआ।
उसने आगे कहा, “रोजा है, इसलिए पैसे देकर अपने लिए लाइन में खड़ा किया है।” इस तरह का खेल बाजार में ब्लैक में गैस की कीमत करीब 300 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। 14 किलो का सिलेंडर यदि उसी हिसाब से लिया जाए तो उसकी कीमत लगभग 4200 रुपये हो जाएगी।
लेकिन यहां मामला अलग है। 913 रुपये का सिलेंडर और 700 रुपये की दिहाड़ी मिलाकर कुल लगभग 1613 रुपये में वही सिलेंडर मिल सकता है। इस अफरा-तफरी के बीच कुछ लोग ऐसे भी थे जो भीड़ को समझाने की कोशिश कर रहे थे। वे कह रहे थे, “घबराइए मत, सब्र रखिए।” न्यू सीलमपुर के हाजी मुकीम भी उन्हीं में से एक थे, जिन्होंने कहा, “लोग खुद ही बेवजह लाइन में लग रहे हैं। घर पर आराम से सिलेंडर बुक करिए, खुद ही आ जाएगा।”
डिलीवरी बॉय का दर्द और क्राइम का खतरा
मुकीम अपनी बात पूरी कर ही रहे थे कि पीछे से एक तेज आवाज आई। एक डिलीवरी बॉय (सूरज) बोला, “ऐसे हालात में हम क्यों घर-घर सिलेंडर देने जाएं? जाना मतलब मौत को दावत देना है।” यह सुनकर आसपास खड़े लोग चुप हो गए। सबकी नजरें उस पर टिक गईं, जैसे सबके मन में एक ही सवाल हो—”क्या हुआ है?”
उसने बताया, “ब्रह्मपुरी रोड पर अशोक (हमारा ही एक डिलीवरी बॉय) सिलेंडर लेकर जा रहा था, दिन-दहाड़े उसे रोक लिया गया। जबरन सिलेंडर लूट लिया गया और जाते-जाते 1000 रुपये फेंककर भाग गए।” उसने कहा, “नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में क्राइम बहुत है। अगर रास्ते में कोई सिलेंडर लूट ले तो हम अपनी जान क्यों जोखिम में डालें?”
सूरज ने आगे कहा, “होली के दौरान कई डिलीवरी बॉय छुट्टी लेकर घर चले गए थे। इसी बीच जंग की खबरों के बीच बुकिंग तेजी से बढ़ गई, जिससे डिलीवरी का काम रुक गया। साथ ही, स्टॉक भी कम हो गया। इसी वजह से लोग बुकिंग का इंतजार किए बिना सीधे गोदामों पर पहुंचने लगे।” अब स्थिति ऐसी है कि सुबह करीब 9.30 बजे गोदाम खुलते हैं, लेकिन लाइन सुबह 5-6 बजे से ही लगनी शुरू हो जाती है। कब स्थिति सामान्य होगी, यह किसी को नहीं पता।











