दिल्ली की सर्दियों में बेघर महिलाओं की जद्दोजहद
सर्दियों के मौसम में दिल्ली दो भागों में बंट जाती है। एक तरफ वह हिस्सा है, जहां लोग कश्मीरी फिरन और पश्मीना की शोभा देखते हैं, घरों में हीटर और रजाइयों के बीच पॉल्यूशन पर चर्चा होती है। वहीं दूसरी ओर, वह हिस्सा है जहां बेघर महिलाएं अपने जीवन की कठिनाइयों से जूझ रही हैं। इन महिलाओं का मुख्य संघर्ष खुद को धुएं और ठंड से नहीं, बल्कि रेप जैसी जघन्य घटनाओं से बचाने का है। ये महिलाएं महंगे कपड़े पहनकर इतराने के बजाय खुद को ठंड से बचाने की कोशिश में लगी रहती हैं। सर्दियों में उन्हें हेल्दी सूप की खुशबू नहीं, बल्कि भरपेट भोजन ही एकमात्र सहारा है।
सड़क किनारे और आश्रय गृह में जीवन की कहानी
aajtak.in ने उन महिलाओं से बात की, जो फ्लाईओवर, सड़क और मंदिर-दरगाहों के किनारे सोती हैं। इनमें से एक महिला, जिनका नाम हमने छुपाया है, कुमुदा, का जीवन संघर्ष भरा है। पहले वह घर-परिवार वाली थीं, मौसम बदलते ही अचार-पापड़ सुखाती थीं और घर की जिम्मेदारियों में लगी रहती थीं। लेकिन वक्त ने पलटा खाया और अब हर रात खुद को सुरक्षित रखने की जद्दोजहद में बिताती हैं।
सराय काले खां का इलाका दिल्ली का एक ऐतिहासिक हिस्सा है, जहां मुगलों के दौर में काफिले गुजरते थे और मुसाफिरों को आश्रय मिलता था। अब यह क्षेत्र बेघर महिलाओं का भी ठिकाना बन चुका है। यहां रहने वाली महिलाएं मुस्कुराते हुए मिलती हैं, लेकिन उनके अंदर की पीड़ा छुपी रहती है।
बेघर महिलाओं का जीवन और संघर्ष
महोबा की इस महिला का जीवन भी सड़क पर बीता है। आश्रय गृह में रहने के बावजूद, उनके पास अपना घर नहीं है। आश्रय गृह में उनके हिस्से में एक छोटा सा कोना है, जहां वे अपने पति के साथ रहती हैं। उनके पास न तो घर की दीवारें हैं, न ही रसोई, और आग लगने के बाद खाना पकाने पर भी रोक लग गई है।
कुमुदा का जीवन संघर्षपूर्ण है। वह बताती हैं कि पहले वह घर-परिवार वाली थीं, त्योहार मनाती थीं, मौसम बदलने पर पापड़ बनाती थीं। लेकिन बीमारियों और आर्थिक तंगी ने सब कुछ बदल दिया। अब वह सड़क पर रहने को मजबूर हैं, और उनके पास न तो अपना घर है, न ही कोई स्थिर ठिकाना।
उनका कहना है कि दिल्ली आने का सपना था, मेहनत कर कुछ कमाने का इरादा था, लेकिन अब वह बस जीवन की जंग लड़ रही हैं। रात में जागरूकता और सुरक्षा की चिंता में बिताती हैं, और अपने जीवन की इस कठिन यात्रा को सहन कर रही हैं।
आश्रय गृह में रहने के बावजूद, उन्हें अपने पुराने घर की याद सताती है। घर जाने की इच्छा तो है, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण वह नहीं जा पातीं। गांव में रहने वाली बहनों से भी दूरी है, और लॉकडाउन के कारण वे अपने परिवार से भी नहीं मिल पाई हैं।
कुमुदा की उम्र चालीस के पार है, और जीवन के इस पड़ाव पर भी वह संघर्ष कर रही हैं। उनके जीवन की कहानी हमें यह सिखाती है कि दिल्ली की सड़कों पर जीवन बिताने वाली महिलाएं कितनी कठिनाइयों का सामना कर रही हैं। उनके संघर्ष और हिम्मत को समझना और उनका समर्थन करना हम सब का कर्तव्य है।










