आम की गुठली से पर्यावरण संरक्षण का अनोखा प्रयास
कहते हैं कि आम खाओ और गुठली मत गिनो, लेकिन दिल्ली के एक व्यक्ति ने इस कहावत को ही बदलकर दिखाया है। इस शख्स ने आम की गुठलियों को गिन-गिन कर करीब 21 लाख पौधे तैयार किए हैं। मीठे आम का स्वाद हर किसी को भाता है, परंतु इसके पीछे छुपी है घटती हरियाली और बढ़ते प्रदूषण की गंभीर समस्या। इसी चिंता ने इस व्यक्ति को प्रकृति का रक्षक बना दिया है। दिल्ली में रहने वाले आयुर्वेदिक डॉक्टर जस्मीत सिंह ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अनूठी पहल शुरू की है, जिसे लोग ‘गुठलीमैन’ के नाम से जानते हैं। वे आम की बेकार समझी जाने वाली गुठलियों को फेंकने के बजाय पेड़ बनाने का काम कर रहे हैं।
सालों पुराना अभियान और उसकी सफलता
इस अभियान की शुरुआत उन्होंने नौ साल पहले 2016 में बहुत ही छोटे स्तर पर की थी। शुरुआत में वे सिर्फ लोगों से आम की गुठलियां इकट्ठा करते थे, लेकिन धीरे-धीरे यह एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप ले चुका है। अब तक लगभग 21 लाख गुठलियों का संग्रह किया जा चुका है, जिनसे आठ लाख से अधिक पौधे तैयार कर किसानों और आम जनता में वितरित किए गए हैं। इस प्रयास का उद्देश्य न केवल पर्यावरण संरक्षण है, बल्कि किसानों की आय में भी वृद्धि करना है।
आम के पेड़ का पर्यावरणीय महत्व और लोगों की भागीदारी
डॉ. जस्मीत सिंह का मानना है कि आम का पेड़ केवल फल देने वाला वृक्ष नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण के लिए एक मजबूत आधार है। यह पेड़ पूरे साल हरा-भरा रहता है, छाया प्रदान करता है और हवा को शुद्ध करने में मदद करता है। साथ ही, यह पक्षियों के लिए भी आश्रय का स्रोत है। हालांकि, आम के पेड़ को पूरी तरह विकसित होने में लगभग 15 साल का समय लगता है, लेकिन एक बार तैयार हो जाने के बाद यह लंबे समय तक पर्यावरण को लाभ पहुंचाता है।
उनकी सरल अपील है कि जब भी आप आम खाएं, उसकी गुठली को फेंकने के बजाय सुखाकर सुरक्षित रखें और अभियान से जुड़ें। सोशल मीडिया के माध्यम से यह मुहिम देश ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी फैल रही है। इस पहल का सबसे बड़ा लाभ किसानों को मिल रहा है, क्योंकि तैयार पौधे सीधे किसानों तक पहुंचाए जाते हैं, जिससे उनकी आय के नए स्रोत बनते हैं और हरियाली भी बढ़ती है। यह मॉडल पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास दोनों को साथ लेकर चलता है।
डॉ. जस्मीत की यह पहल यह साबित करती है कि बदलाव के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बल्कि छोटी-छोटी आदतों की जरूरत होती है। आम की गुठली, जो सामान्यतः कचरे में चली जाती है, आने वाले समय में एक हरे-भरे भविष्य की नींव बन सकती है।











