हवाई यात्रा में GPS स्पूफिंग और GNSS इंटरफेरेंस का खतरा बढ़ रहा है
देश के प्रमुख हवाई अड्डों के पास उड़ान भरने वाले विमानों में GPS स्पूफिंग और GNSS इंटरफेरेंस की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। सरकार ने इस संबंध में संसद को जानकारी देते हुए बताया कि इन खतरों का प्रभाव उड़ान सुरक्षा पर गंभीर हो सकता है।
सरकार ने स्वीकार किया है कि सेटेलाइट संकेतों में हस्तक्षेप उड़ानों की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय है। इस कारण से निगरानी प्रणालियों को मजबूत बनाने और तकनीकी जांच को तेज करने का निर्णय लिया गया है।
संसद में यह भी आश्वासन दिया गया कि सभी बड़े हवाई अड्डे इन घटनाओं को नियमित रूप से दर्ज कर रहे हैं ताकि किसी भी संभावित खतरे का तुरंत समाधान किया जा सके।
GPS स्पूफिंग क्या है और यह क्यों खतरनाक है?
GPS स्पूफिंग एक प्रकार का साइबर हमला है, जिसमें हमलावर नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजते हैं। इससे विमान या GPS-आधारित उपकरण गलत स्थान या गलत जानकारी दिखाने लगते हैं।
ऐसे में विमान का नेविगेशन सिस्टम गलत पोजिशन, गलत अलर्ट या गलत टेरेन वार्निंग प्राप्त कर सकता है। इससे विमान अपनी वास्तविक दिशा से भटक सकता है या सिस्टम ऐसी स्थिति दिखा सकता है जो वास्तव में मौजूद नहीं है।
हाल ही में दिल्ली एयरपोर्ट के पास कई उड़ानों को लगभग 60 नॉटिकल मील दूर गलत लोकेशन डेटा मिला, जिसके कारण कुछ विमानों को नजदीकी एयरपोर्ट जैसे जयपुर और लखनऊ की ओर डायवर्ट करना पड़ा।
एयरपोर्ट के आसपास GPS स्पूफिंग के खतरे और सुरक्षा उपाय
यदि एयरपोर्ट के आसपास GPS स्पूफिंग या GNSS इंटरफेरेंस हो जाए, तो इसका सीधा असर नेविगेशन, एयरस्पेस सुरक्षा और पायलट के कार्यभार पर पड़ता है। आधुनिक विमानों में ये सिस्टम अत्यधिक निर्भर हैं, इसलिए इन संकेतों में बदलाव बड़ा खतरा पैदा कर सकता है।
गड़बड़ी से विमान की स्थिति, ऊंचाई और गति जैसे डेटा में त्रुटि हो सकती है, जिससे विमान निर्धारित रूट से भटक सकता है या सैन्य और संवेदनशील इलाकों में अनजाने में प्रवेश कर सकता है। यह सुरक्षा के लिहाज से बहुत बड़ा जोखिम है।
रनवे अवेयरनेस, टेरेन वार्निंग और ऑटोपायलट जैसे महत्वपूर्ण सिस्टम GPS पर आधारित हैं। यदि इन पर स्पूफिंग का असर पड़े, तो ये सिस्टम गलत अलर्ट दे सकते हैं या पूरी तरह से फेल हो सकते हैं, जिससे टेरेन से टकराने का खतरा बढ़ जाता है।
खासतौर पर जब विमान लैंडिंग या अप्रोच के दौरान जमीन के बहुत करीब होता है, तब गलत पोजिशन डेटा से रनवे मिसअलाइनमेंट, ग्लाइड पाथ में गड़बड़ी या गो-अराउंड जैसी घटनाएं हो सकती हैं।
इसके अलावा, जब एक ही क्षेत्र में कई विमानों का GPS डेटा गड़बड़ा जाता है, तो एयर ट्रैफिक कंट्रोल (ATC) के लिए सही लोकेशन का पता लगाना मुश्किल हो जाता है। इससे विमानों के बीच सेपरेशन कम हो सकता है और वर्कलोड बढ़ने से हादसों का खतरा भी बढ़ जाता है।
इसलिए, एयरपोर्ट के आसपास GNSS संकेतों का संरक्षण और रेडंडेंसी सिस्टम्स का इस्तेमाल अत्यंत आवश्यक है, ताकि इन खतरों से बचा जा सके और हवाई यात्रा सुरक्षित बनी रहे।










