दिल्ली रेस क्लब और पोलो ग्राउंड का ऐतिहासिक महत्व और वर्तमान संकट
दिल्ली का प्रसिद्ध रेस क्लब और जयपुर पोलो ग्राउंड, दोनों ही दिल्ली की खेल और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न हिस्सा हैं। ये स्थल ब्रिटिश काल से जुड़े हुए हैं और खेल के साथ-साथ सामाजिक और राजनयिक गतिविधियों का भी केंद्र रहे हैं। हाल ही में, भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने इन दोनों संस्थानों को उनके-उनके परिसरों को खाली करने का नोटिस जारी किया है, जिससे विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई है। यह कदम 15 दिनों के भीतर इन स्थलों को खाली करने का निर्देश देता है, जो कानूनी और ऐतिहासिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इस विवाद का मुख्य आधार यह है कि इन जमीनों का उपयोग लंबे समय से हो रहा है, लेकिन सरकार का तर्क है कि अब इन जमीनों की जरूरत बड़े शहरी विकास योजनाओं के लिए है।
क्लब और मैदान की विरासत और कानूनी जंग
दिल्ली रेस क्लब का इतिहास 1926 से शुरू होता है, जब इसकी स्थापना हुई थी। यह क्लब घुड़दौड़ और रेसिंग के क्षेत्र में भारत का एक प्रमुख केंद्र रहा है। इसके सचिव और सीईओ, कर्नल एस.के. बख्शी (सेवानिवृत्त), ने बताया कि यह क्लब अपने 100 वर्षों से अधिक के इतिहास में कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों का हिस्सा रहा है। वे बताते हैं कि क्लब ने सरकार से वैकल्पिक स्थान की मांग की है, ताकि उनके सदस्यों और घोड़ों का स्थानांतरण संभव हो सके। वहीं, जयपुर पोलो ग्राउंड का नाम भारत के प्रसिद्ध पोलो खिलाड़ी महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय के नाम पर है, जिन्होंने इस खेल को विश्व स्तर पर पहचान दिलाई। दोनों स्थल ब्रिटिश कालीन परंपरा और खेल संस्कृति का प्रतीक हैं, और इनकी विरासत को खतरे में देख कर समुदाय और खेल प्रेमी चिंतित हैं।
आधिकारिक प्रक्रिया और भविष्य की योजनाएँ
12 मार्च 2026 को जारी नोटिस में कहा गया है कि इन स्थलों की लीज समाप्त हो चुकी है और इन जमीनों का उपयोग बड़े शहरी विकास के लिए किया जाना है। हालांकि, कानून के अनुसार, बिना उचित प्रक्रिया के इन स्थलों को खाली कराना संभव नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में फिलहाल किसी भी तरह की दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी है। अधिकारियों का तर्क है कि इन जमीनों का पुनर्विकास राष्ट्रीय महत्व का है, और भविष्य में इनका उपयोग सरकारी इंफ्रास्ट्रक्चर या केंद्रीय विस्टा परियोजना के तहत किया जा सकता है। अभी तक कोई स्पष्ट योजना सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन इन जमीनों की कीमत हजारों करोड़ रुपये आंकी जा रही है, और यह रणनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।










