मौत की सजा के तरीके में बदलाव की मांग
देश में मृत्युदंड पाने वाले कैदियों को फांसी की सजा दी जाती है, जो प्रक्रिया लंबी और दर्दनाक मानी जाती है। इस जटिल प्रक्रिया को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इसे बदलने की मांग उठाई गई है। हालांकि केंद्र सरकार फिलहाल इस बदलाव के पक्ष में नहीं है। न्यायालय ने इस पर नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि सरकार को समय के साथ अपने रवैये में बदलाव लाना चाहिए।
अंतरराष्ट्रीय मानकों से तुलना और वर्तमान स्थिति
वर्तमान में अमेरिका (USA) जैसे देशों में जहरीले इंजेक्शन का प्रयोग कर मौत की सजा को अधिक मानवीय और आसान माना जाता है। इन देशों में मौत की प्रक्रिया तेज और कम दर्दनाक होती है, जिससे कैदियों को अधिक सम्मानजनक तरीके से मौत दी जाती है। इसके विपरीत भारत में फांसी की प्रक्रिया लंबी और पीड़ादायक है, जिसमें कई बार हड्डी पूरी तरह से टूटने में समय लग जाता है, जिससे कैदी दर्द में रहता है।
फांसी की प्रक्रिया और उसकी चुनौतियां
फांसी देने के लिए प्रशिक्षित कर्मियों की कमी एक बड़ी समस्या है। यदि फांसी का प्रयास असफल हो जाए, तो कैदी को फिर से सजा नहीं दी जा सकती, क्योंकि कानून दोहरे दंड की मनाही करता है। इस स्थिति में कैदी को रिहा करना पड़ता है, जो समाज के लिए खतरनाक हो सकता है। साथ ही, फांसी की प्रक्रिया में भी कई खामियां हैं, जैसे सही तरीके से न टुटने वाली हड्डी या दर्दनाक मौत का खतरा।
मानवीय दृष्टिकोण और विकल्पों की आवश्यकता
फांसी की सजा सुनाने के बाद कैदी जेल में ही मौत का इंतजार करता है, जो एक अमानवीय प्रक्रिया है। वर्तमान में कई देशों ने इस प्रक्रिया को खत्म कर दिया है और जहरीले इंजेक्शन को अपनाया है। इस प्रक्रिया में तीन दवाओं का प्रयोग होता है: पहली बेहोशी के लिए, दूसरी मांसपेशियों को निष्क्रिय करने के लिए और तीसरी दिल की धड़कन रुकने के लिए। यह तरीका तेज और कम दर्दनाक माना जाता है, लेकिन इसमें भी गलत इंजेक्शन लगाने का खतरा रहता है।
सरकार का रुख और भविष्य की दिशा
बुधवार को हुई सुनवाई में केंद्र सरकार ने कहा कि यह नीतिगत मामला है और इसे तय करने का अधिकार संसद का है। यदि कोई नया तरीका अपनाना है, तो सरकार ही निर्णय लेगी। अगली सुनवाई नवंबर में होगी, जिसमें यह तय किया जाएगा कि क्या कैदियों को विकल्प दिए जाएंगे या मौजूदा प्रक्रिया ही जारी रहेगी।











