बिहार में शराबबंदी नीति की असफलताएँ और राजनीतिक प्रभाव
बिहार में 2016 से लागू शराबबंदी कानून (Bihar Prohibition and Excise Act) ने राज्य की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया है। इस नीति की शुरुआत मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने महिलाओं की सुरक्षा, घरेलू हिंसा में कमी और सामाजिक सुधार के उद्देश्य से की थी। हालांकि, समय के साथ यह स्पष्ट हो गया है कि यह शराबबंदी योजना पूरी तरह से असफल साबित हुई है।
राज्य में शराबबंदी के खिलाफ विपक्षी दलों की आलोचनाएँ तेज हो रही हैं। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेता इस नीति का मूल्यांकन कर रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) खुलकर इसका विरोध करते हैं। बावजूद इसके, चुनावी मंचों पर कोई भी दल इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की हिम्मत नहीं दिखाता। यहां तक कि महागठबंधन के घोषणापत्र में भी शराबबंदी की समीक्षा का उल्लेख है, लेकिन नेता तेजस्वी यादव जैसे नेता इस नीति को समाप्त करने का कोई संकेत नहीं देते।
शराबबंदी की विफलताओं का आंकड़ा और सामाजिक प्रभाव
पिछले नौ वर्षों में बिहार में शराबबंदी के कारण करीब 12.79 लाख लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें से 85 प्रतिशत से अधिक एससी, ईबीसी और ओबीसी वर्ग के हैं। अवैध शराब का कारोबार अब लगभग 20,000 करोड़ रुपये का हो चुका है, जिससे राज्य को लगभग 30,000 करोड़ रुपये का राजस्व नुकसान हुआ है। साथ ही, 2022 में सारण (Saran) जिले में जहरीली शराब से 70 से अधिक मौतें हुईं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि शराबबंदी का उद्देश्य सामाजिक सुधार के बजाय अपराध और माफिया गठजोड़ को बढ़ावा देना बन गया है। बावजूद इसके, इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच कोई बड़ा आंदोलन या जनाक्रोश देखने को नहीं मिल रहा है। यह स्थिति दर्शाती है कि सामाजिक और आर्थिक स्तर पर यह नीति कितनी विफल रही है।
राजनीतिक दलों की रणनीति और चुनावी माहौल
महिला वोट बैंक और शराबबंदी का राजनीतिक महत्व
नीतीश कुमार की जेडीयू (JD(U)) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) इस नीति को महिलाओं के वोट बैंक से जोड़ते हैं। 2024 की लैंसेट रिपोर्ट के अनुसार, बिहार में घरेलू हिंसा के मामलों में उल्लेखनीय कमी आई है, जो पहले 40 प्रतिशत तक थी, अब लगभग शून्य हो गई है। ग्रामीण महिलाएं, जो जीविका दीदियों के रूप में कार्यरत हैं, इस नीति का समर्थन करती हैं। NDA इसे सुशासन का प्रतीक मानकर महिलाओं को आकर्षित कर रहा है।
यह भी देखा गया है कि कोई भी राजनीतिक दल इस मुद्दे को लेकर खुलकर सामने आने से डर रहा है, क्योंकि महिलाओं का समर्थन इस नीति के साथ बना हुआ है। नीतीश कुमार ने ही महिलाओं को वोट बैंक बनाने की शुरुआत की थी, और आज भी यह रणनीति उनके राजनीतिक आधार का मुख्य स्तंभ है।
NDA और विपक्ष की स्थिति
NDA खासकर जेडीयू (JDU) चुनावी अभियान में शराबबंदी पर बोलने से बच रहा है। विपक्षी दल जैसे आरजेडी (RJD) और कांग्रेस इस नीति को विफल बताते हुए इसे समीक्षा की बात कर रहे हैं। महागठबंधन का घोषणापत्र भी शराबबंदी को खत्म करने की दिशा में संकेत देता है, जिसमें ताड़ी पर प्रतिबंध हटाने और गरीबों को जेल से रिहा करने का प्रस्ताव है।
वहीं, विपक्षी दलों का मानना है कि यह नीति आर्थिक रूप से नुकसानदायक है और इससे राज्य का राजस्व भी घट रहा है। बावजूद इसके, आम जनता में इस मुद्दे पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं देखी जा रही है, क्योंकि रोजगार, जाति जनगणना और वोट चोरी जैसे अन्य मुद्दे अधिक चर्चा में हैं।
सामाजिक-आर्थिक वास्तविकता और भविष्य की दिशा
शराबबंदी की विफलताओं का सामाजिक प्रभाव
पिछले नौ वर्षों में बिहार में शराबबंदी के कारण अनेक सामाजिक और आर्थिक समस्याएं उत्पन्न हुई हैं। 12.79 लाख गिरफ्तारियों में से अधिकांश गरीब वर्ग से हैं, और अवैध शराब का कारोबार अब 20,000 करोड़ रुपये का हो चुका है। इस नीति के कारण 190 से अधिक मौतें हुई हैं, जिनमें सारण जहरीली शराब कांड भी शामिल है।
इन आंकड़ों से पता चलता है कि शराबबंदी का उद्देश्य सामाजिक सुधार के बजाय अपराध और माफिया के हित में काम कर रहा है। फिर भी, यह मुद्दा राजनीतिक रूप से कमजोर है, क्योंकि अधिकांश वोटर इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं देते।
राजनीतिक दलों के बीच मतभेद और भविष्य की संभावनाएँ
शराबबंदी को लेकर NDA में ही मतभेद स्पष्ट हैं। जेडीयू (JDU) नेता जीतन राम मांझी इसे गरीबों के साथ अन्याय मानते हैं, जबकि भाजपा (BJP) इसे जारी रखने का समर्थन करती है। सोशल मीडिया पर युवा वोटर और ओबीसी/एससी समुदाय इस नीति के खिलाफ नाराजगी जता रहे हैं।
फिर भी, नीतीश कुमार की लोकप्रियता और महिलाओं का समर्थन इस नीति को बनाए रखने में मदद कर रहा है। 2020 में NDA ने 125 सीटें जीती थीं, जो इस नीति के राजनीतिक समर्थन का संकेत है। आने वाले समय में यह मुद्दा कितना प्रभावी रहेगा, यह राजनीतिक समीकरणों पर निर्भर करेगा।











