स्मार्ट सिटी मिशन की वास्तविक स्थिति और चुनौतियां
25 जून 2015 को आवास और शहरी विकास मंत्रालय ने देश के 100 प्रमुख शहरों को आधुनिक बनाने के उद्देश्य से स्मार्ट सिटी मिशन की शुरुआत की थी। इस योजना का मकसद ट्रैफिक जाम से राहत, स्वास्थ्य सुविधाओं के लिए खुले जिम, स्वच्छता के लिए अत्याधुनिक वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम और ई-गवर्नेंस जैसी सेवाओं को लागू करना था। इन दस वर्षों में इस परियोजना पर लगभग 1 लाख 64 हजार करोड़ रुपये का निवेश किया गया, लेकिन कई शहरों की जमीनी रिपोर्टें इस योजना की सफलता पर सवाल खड़े कर रही हैं।
भोपाल, भागलपुर, जयपुर और लुधियाना की जमीनी हकीकत
भोपाल में स्मार्ट सिटी परियोजना पर करीब 1400 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जिसमें 5 करोड़ रुपये की लागत से 500 साइकिलें खरीदी गई थीं। आज ये साइकिलें जंग खाकर खड़ी हैं और शहर के कई स्टैंड खाली पड़े हैं। वहीं, बड़े तालाब पर लगाए गए सोलर पैनल भी उपेक्षा का शिकार हैं, और इनकी स्थिति शोपीस जैसी बन चुकी है।
भागलपुर में स्मार्ट सिटी पर 1309 करोड़ रुपये खर्च हुए, लेकिन जमीन पर स्थिति विपरीत है। एयरपोर्ट के पास बनाए गए कचरे से भरे कचरे के ढेर और खराब रखरखाव के कारण हाईटेक ई-टॉयलेट भी बेकार हो चुके हैं। मेयर ने बताया कि केवल 15 वार्ड ही स्मार्ट सिटी के तहत विकसित किए गए हैं, जबकि कुल 51 वार्डों में से अधिकांश अभी भी पुराने ढर्रे पर हैं।
जयपुर में करीब 1000 करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद कई प्रोजेक्ट अधूरे पड़े हैं। स्वच्छता के लिए 100 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी शहर में गंदगी का माहौल बना हुआ है। कमांड सेंटर में केवल आधे रजिस्टर्ड हूपर ही नियमित रूप से काम कर रहे हैं, और कई लाइटें टूट चुकी हैं। अंडरग्राउंड डक्ट में केबल नहीं डाली गई है, और स्मार्ट टॉयलेट भी बेकार हो चुके हैं।
लुधियाना और कानपुर की स्थिति भी चिंताजनक
लुधियाना में भी स्मार्ट सिटी पर लगभग 1000 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन बुनियादी सुविधाओं का अभाव अभी भी बना हुआ है। हाईटेक ट्रैफिक सिस्टम और सीसीटीवी जैसी सुविधाएं दूर की बात हैं। सफाई के लिए घोषित 650 करोड़ रुपये का भी कोई खास असर नहीं दिख रहा है।
कानपुर को कागजों में देश के सबसे साफ शहरों में 13वां स्थान मिला है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग है। शहर में जगह-जगह कूड़ा और गंदगी फैली हुई है, और नहर के किनारे कूड़े की ऊंची दीवारें बनी हैं। रामबाग में सड़क पर सात महीने से गड्ढा खुला पड़ा है, जिससे रास्ता बंद हो गया है।
सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर भी इन शहरों में बदलाव क्यों नहीं दिख रहा है? जनता की सुविधाओं का रखरखाव क्यों नहीं हो रहा है? आखिरकार, देश के इन 100 शहरों को वाकई स्मार्ट बनाने का सपना कब पूरा होगा, और टैक्स पेयर्स के पैसे का सही उपयोग कौन सुनिश्चित करेगा?










