बिहार विधानसभा चुनाव में विपक्षी महागठबंधन की हार का विश्लेषण
बिहार के विधानसभा चुनाव परिणामों ने विपक्षी महागठबंधन को भारी निराशा में डाल दिया है। इस बार की चुनावी प्रक्रिया में राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख भूमिका में थी, लेकिन परिणामों में उसकी स्थिति पिछली बार की तुलना में काफी कमजोर साबित हुई। 2015 और 2020 के चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी आरजेडी इस बार केवल 25 सीटों तक सीमित रह गई। हार के बाद पार्टी ने अपनी रणनीति और प्रदर्शन का गहन विश्लेषण शुरू कर दिया है।
आंतरिक मतभेद और सहयोगी दलों की भूमिका पर सवाल
समीक्षा बैठकों में आरजेडी के भीतर चल रही असंतोष की आवाजें स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही हैं। हाल ही में संपन्न चुनाव में हार का सामना करने वाले उम्मीदवारों ने तेजस्वी यादव की कोर टीम की कार्यशैली पर सवाल उठाए हैं। साथ ही, उन्होंने महागठबंधन के सहयोगी दलों-जैसे कांग्रेस, लेफ्ट, वीआईपी और आईआईपी-से अपेक्षित सहयोग न मिलने का भी आरोप लगाया है। इन उम्मीदवारों का मानना है कि गठबंधन में शामिल दलों ने उनके साथ अपेक्षा के अनुरूप समर्थन नहीं दिया।
आगामी समीक्षा बैठकें और पार्टी के आंतरिक मतभेद
बुधवार को आरजेडी ने मगध प्रमंडल की विधानसभा सीटों को लेकर समीक्षा बैठक की, जिसमें हार का सामना करने वाले उम्मीदवारों ने तेजस्वी यादव की टीम की कार्यशैली पर सवाल उठाए और सहयोगी दलों को भी कठघरे में खड़ा किया। उम्मीदवारों का कहना है कि पार्टी में सामंजस्य की कमी हार का मुख्य कारण रही है। 28 नवंबर को सारण प्रमंडल की सीटों को लेकर भी समीक्षा बैठक आयोजित की जानी है, और यह सिलसिला नौ दिसंबर तक जारी रहेगा।
इसी बीच, कांग्रेस ने भी हाल ही में बिहार चुनाव परिणामों को लेकर समीक्षा बैठक की। दिल्ली में हुई इस बैठक में भी मतभेद देखने को मिले। वल्लाह से उम्मीदवार रहे इंजीनियर संजीव और पूर्णिया के प्रत्याशी जितेंद्र यादव के बीच तीखी बहस हुई, जिसमें टिकट वितरण को लेकर विवाद उभरा। संजीव ने चुनाव से पहले आए 18 नेताओं की वजह से पार्टी को नुकसान पहुंचने का आरोप लगाया, जबकि यादव ने इस बात का खंडन किया। बहस इतनी बढ़ गई कि संजीव ने यादव को गोली मारने की धमकी तक दे दी, जिसे बाद में संजीव ने अपने बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश करने का दावा किया।











