बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में टिकट वितरण का विश्लेषण
बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के लिए उम्मीदवारों के चयन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राजनीतिक दलों पर आरोपों का दौर शुरू हो गया है। खासतौर पर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) और कांग्रेस पर यह आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने जाति आधारित जनगणना के दावों को नजरअंदाज कर अपने टिकट वितरण में राजनीतिक स्वार्थ को प्राथमिकता दी है। दोनों ही पार्टियों ने अपने चुनावी रणनीति में जाति जनगणना के आधार पर हिस्सेदारी का दावा तो किया, लेकिन असल में यह दिखावा ही साबित हो रहा है।
सामाजिक न्याय का दिखावा, राजनीतिक स्वार्थ का खेल
विशेषज्ञों का कहना है कि इन दोनों दलों ने जाति जनगणना के आधार पर सामाजिक न्याय का झूठा दावा किया है। आरजेडी ने अपने पारंपरिक वोट बैंक मुस्लिम-यादव (MY) को प्राथमिकता दी, जबकि अन्य पिछड़ी जातियों, दलितों और अत्यंत पिछड़ी जातियों (EBC) को नजरअंदाज कर दिया। वहीं कांग्रेस ने भी कुछ खास जातियों को टिकट देकर अपने परंपरागत वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास किया है। इससे स्पष्ट है कि जाति जनगणना के आधार पर हिस्सेदारी का दावा केवल दिखावा है, असल में राजनीतिक लाभ ही मुख्य उद्देश्य है।
टिकट वितरण में जातीय समीकरण और उसकी वास्तविकता
आरजेडी ने कुल 143 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें यादव जाति को सबसे अधिक 51 टिकट मिले हैं। यह संख्या उनके कुल वोट प्रतिशत से कहीं अधिक है, जो दिखाता है कि यादव समुदाय को विशेष प्राथमिकता दी गई है। इसी तरह मुस्लिम समुदाय को भी टिकटों का वितरण उनके जनसंख्या अनुपात से कम ही मिला है। बिहार में यादव की जनसंख्या लगभग 14 प्रतिशत है, लेकिन उन्हें 36 प्रतिशत टिकट मिले हैं। मुस्लिम समुदाय की जनसंख्या करीब 18 प्रतिशत है, पर उन्हें केवल 13 प्रतिशत टिकट ही मिले हैं। इससे स्पष्ट है कि जाति आधारित टिकट वितरण में असमानता और राजनीतिक लाभ का खेल चल रहा है।
कांग्रेस का जाति आधारित टिकट वितरण और उसकी रणनीति
महागठबंधन में कांग्रेस ने 61 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, लेकिन जाति गणना के आंकड़ों को नजरअंदाज कर सवर्णों (15%) को प्राथमिकता दी है। पार्टी ने 19 सवर्ण उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जिनमें से अधिकांश भूमिहार जाति से हैं। वहीं, पिछड़ी जातियों (OBC 27% + EBC 36%) और दलितों (19%) को अपेक्षाकृत कम टिकट मिले हैं। कांग्रेस ने अपने रणनीतिक कदम में सवर्ण वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास किया है, लेकिन इससे EBC और दलित वर्ग में नाराजगी बढ़ने का खतरा है। जाति जनगणना के आंकड़ों के विपरीत, पार्टी का यह कदम सामाजिक न्याय के दावों को कमजोर कर सकता है।
राजनीतिक निहितार्थ और भविष्य की संभावनाएं
यह टिकट वितरण बिहार की राजनीति में दोहरे खतरे का संकेत है। एक ओर आरजेडी अपने पारंपरिक वोट बैंक यादव और मुस्लिम पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जिससे EBC और दलित वर्ग का भरोसा टूट सकता है। दूसरी ओर कांग्रेस ने सवर्णों को अधिक टिकट देकर अपने वोट बैंक को सुरक्षित करने का प्रयास किया है, लेकिन इससे पिछड़ी जातियों में असंतोष बढ़ सकता है। यदि EBC और दलित वर्ग महागठबंधन से दूर हो गए, तो जाति जनगणना का नैरेटिव कमजोर पड़ जाएगा और NDA (National Democratic Alliance) की सामाजिक इंजीनियरिंग मजबूत हो सकती है। इस तरह, आगामी चुनाव में जाति आधारित समीकरण और सामाजिक न्याय का खेल निर्णायक भूमिका निभा सकता है।









