बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में मतदान में बढ़ोतरी के कारण और राजनीतिक संकेत
बिहार विधानसभा चुनाव के पहले चरण में इस बार लगभग 8 प्रतिशत अधिक मतदान दर्ज किया गया है, जो पिछले चुनाव की तुलना में काफी अधिक है। यह बढ़ोतरी न केवल मतदाताओं के उत्साह का प्रतीक है, बल्कि लोकतंत्र में सुधार और जागरूकता का भी संकेत है। इस चुनाव में मतदान प्रतिशत में यह उछाल चुनाव प्रबंधन में नई तकनीकों और मतदाता जागरूकता अभियानों का परिणाम माना जा रहा है।
मतदान में सुधार और चुनाव प्रबंधन की नई तकनीकें
पिछले कुछ वर्षों में बिहार में मतदाता सूचियों में व्यापक सुधार किए गए हैं। चुनाव आयोग ने इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन के माध्यम से डुप्लीकेट, मृत या फर्जी नामों को हटाया है, जिससे वास्तविक मतदाताओं की संख्या घट गई है। इससे मतदान प्रतिशत में स्वाभाविक वृद्धि देखी गई है। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी क्षेत्र में पहले दस लाख मतदाता थे और अब नौ लाख रह गए हैं, तो मतदान प्रतिशत में वृद्धि का कारण फर्जी या निष्क्रिय मतदाताओं का हटना है।
इसके अलावा, मतदाताओं को उनके बूथ, मतदान केंद्र और चुनाव प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी समय पर पहुंचाने के लिए डिजिटल तकनीकों का इस्तेमाल किया गया है। ग्रामीण इलाकों में पंचायत स्तर पर सक्रिय स्वयंसेवकों और शिक्षकों के माध्यम से यह अभियान प्रभावी रहा। पहली बार फेस रिकग्निशन तकनीक और QR-आधारित मतदाता स्लिप का प्रयोग भी हुआ, जिससे मतदान अधिक पारदर्शी और सुरक्षित बना। इन सुधारों ने मतदान प्रतिशत में उल्लेखनीय बढ़ोतरी की है, जो राजनीतिक उत्साह के साथ-साथ चुनाव प्रबंधन की सफलता का भी संकेत है।
महिला मतदाताओं की भागीदारी और नीतीश फैक्टर का प्रभाव
इस बार बिहार में महिलाओं की लंबी कतारें मतदान केंद्रों पर देखने को मिली हैं, जो ऐतिहासिक रूप से पहली बार इतना बड़ा समर्थन दिखाती हैं। महिलाओं ने जाति, धर्म और समुदाय की परवाह किए बिना नीतीश कुमार को वोट देने का फैसला किया है। कई जगह महिलाओं ने अपने पति और बेटों के विरोध के बावजूद अपने मत का प्रयोग किया। यह न केवल महिला सशक्तिकरण का प्रतीक है, बल्कि नीतीश कुमार की लोकप्रियता का भी प्रमाण है।
नीतीश कुमार ने पिछले वर्षों में महिलाओं के जीवन में सुधार लाने के लिए कई योजनाएं शुरू की हैं, जैसे मुख्यमंत्री साइकिल योजना, कन्या उत्थान योजना और शराबबंदी। इन कदमों ने महिलाओं के बीच भरोसा और समर्थन बढ़ाया है। शराबबंदी से घरेलू हिंसा और नशे की समस्या में कमी आई है, जिससे महिलाओं का मनोबल मजबूत हुआ है। साथ ही, नई योजनाओं जैसे महिला सम्मान योजना ने भी महिलाओं के आर्थिक और सामाजिक स्थिति को बेहतर बनाने में मदद की है।
विरोधी दलों का वोटिंग और जातीय समीकरण
बिहार में इस बार अधिक मतदान का एक कारण यह भी है कि कुछ जातियों और समुदायों ने सत्ता परिवर्तन के लिए जोरदार समर्थन दिखाया है। खासकर दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले मुस्लिम समुदाय ने बड़े पैमाने पर मतदान किया है, ताकि बीजेपी की सरकार न बने। वहीं, यादव, अतिपिछड़ा, महादलित और सीमांत पिछड़ी जातियों ने तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री बनाने की इच्छा जताई है। इन वर्गों का मानना है कि विकास और रोजगार के वादे पूरे न होने के बावजूद, तेजस्वी को मौका देना चाहिए।
वहीं, कुछ ओबीसी और ईबीसी समुदायों में यह धारणा है कि नीतीश कुमार का शासन अब बड़े वर्गों की ओर झुक गया है, और स्थानीय नेतृत्व को अवसर नहीं मिल रहा है। महादलित समुदाय के कुछ हिस्सों में यह भी महसूस किया जा रहा है कि सरकारी योजनाओं का लाभ प्रभावी ढंग से नीचे तक नहीं पहुंच रहा है। इन असंतोषों को विपक्ष ने अपने प्रचार का केंद्र बनाया है, जिसमें रोजगार, युवाओं की आवाज और बदलाव की जरूरत प्रमुख मुद्दे हैं।
साइलेंट वोटर और त्रिकोणीय मुकाबला
प्रशांत किशोर के जन सुराज अभियान और क्षेत्रीय दलों जैसे भीम आर्मी, वीआईपी पार्टी और हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा की सक्रियता ने चुनाव को त्रिकोणीय बना दिया है। इस बार मतदान में बढ़ोतरी का संकेत यह भी है कि साइलेंट वोटर जो मुख्य दलों से जुड़ा नहीं है, उसने भी मतदान केंद्रों तक पहुंच बनाई है। यह वर्ग सोशल मीडिया पर कम मुखर होता है, लेकिन चुनाव परिणामों को प्रभावित कर सकता है। यदि इन छोटे दलों को 3-4 प्रतिशत वोट भी मिलते हैं, तो यह कई सीटों पर निर्णायक साबित हो सकता है।
इस बार दोनों पक्षों के समर्थकों में प्रतिस्पर्धा का माहौल दिख रहा है। चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में दोनों ही दलों ने अपनी कोर वोट-बेस को सक्रिय करने का प्रयास किया। नीतीश कुमार ने अपने अनुभव और कार्यों को मुख्य मुद्दा बनाया, जबकि तेजस्वी यादव ने युवाओं और रोजगार को प्राथमिकता दी। इससे शहरी और ग्रामीण दोनों इलाकों में मतदाता सक्रिय हुए और बूथों पर लंबी कतारें देखने को मिलीं।
जब मतदान प्रतिशत बहुत कम होता है, तो यह उदासीनता या असंतोष का संकेत होता है। लेकिन इस बार अधिक मतदान और दोनों पक्षों का सक्रिय प्रतिस्पर्धा दर्शाता है कि चुनाव बहुत करीबी और जटिल स्थिति में है, जो राजनीतिक समीकरणों को बदल सकता है।










