बिहार चुनाव में महागठबंधन की रणनीति और कांग्रेस की भूमिका
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान महागठबंधन में कांग्रेस की स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही है। हालांकि, आरजेडी (RJD) के नेतृत्व से कांग्रेस का रिश्ता कुछ खटास भरा रहा, लेकिन पार्टी अपनी अहमियत को समझाने और दिखाने में लगी हुई है। अब कांग्रेस यह स्पष्ट करने लगी है कि वह महागठबंधन की पिछलग्गू नहीं है, बल्कि उसकी अपनी भी एक अलग पहचान है। बिहार प्रभारी कृष्णा अल्लावरु के अनुसार, महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस पहले से तय थी, लेकिन उसमें उन घोषणाओं का अभाव रहा, जो कांग्रेस के हिसाब से जरूरी थीं।
महागठबंधन की घोषणाएं और कांग्रेस का असंतोष
महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में वही घोषणाएं हुईं, जो लालू यादव (Lalu Yadav) चाहते थे, न कि राहुल गांधी (Rahul Gandhi)। खास बात यह है कि तेजस्वी यादव (Tejashwi Yadav) को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित करने का फैसला तो हुआ, लेकिन कांग्रेस को इससे क्या मिला, इस पर सवाल खड़े हो रहे हैं। यदि राहुल गांधी ने बिहार चुनाव के लिए छह महीने का समय नहीं दिया होता, तो भी सीट बंटवारे में उन्हें कम ही मिलता।
कांग्रेस की स्थिति और सीटों का बंटवारा
बिहार में कांग्रेस की स्थिति VIP (Vikasheel Insaan Party) जैसी पार्टी से भी कमजोर मानी जा रही है। कांग्रेस ने 15 सीटों पर दावा किया था, लेकिन मुकेश सहनी (Mukesh Saini) जैसी छोटी पार्टी ने भी अपने उम्मीदवार वापस लिए हैं। वहीं, आरजेडी ने अपने किसी भी उम्मीदवार को वापस नहीं लिया है, जिससे मुकाबला अभी भी दोस्ताना बना हुआ है। तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री पद का चेहरा बनना तय था, लेकिन सार्वजनिक रूप से इसकी घोषणा नहीं की गई।
कांग्रेस की रणनीति और चुनावी समीकरण
कांग्रेस की रणनीति में स्पष्ट रूप से दिख रहा है कि वह बिहार चुनाव में अपनी भूमिका को लेकर असमंजस में है। राहुल गांधी ने बिहार का दौरा तब किया, जब दिल्ली में विधानसभा चुनाव चल रहे थे। उन्होंने लालू परिवार से मुलाकात की, लेकिन तेजस्वी यादव के जातिगत गणना कराने के दावे को खारिज कर दिया। साथ ही, उन्होंने कन्हैया कुमार (Kanhaiya Kumar) की ‘पलायन रोको, नौकरी दो’ यात्रा का समर्थन किया, लेकिन यह यात्रा भी रोक दी गई।
राहुल गांधी का दूरी बनाना और तेजस्वी यादव का विरोध
राहुल गांधी ने बिहार में अपनी मौजूदगी तब दिखाई, जब क्षेत्रीय दलों के साथ उनकी नजदीकियां कम हो रही थीं। उन्होंने लालू यादव और तेजस्वी यादव के खिलाफ आरोपों के बीच, कन्हैया कुमार की यात्रा का समर्थन किया, लेकिन बाद में यह यात्रा रद्द कर दी गई। तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का चेहरा न मानने का मुद्दा भी कांग्रेस और आरजेडी के बीच तनाव का कारण बना।
राहुल गांधी का ‘सरेंडर’ और कांग्रेस की कमजोरी
अब तो यह स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस पूरी तरह से आरजेडी (RJD) नेतृत्व की कृपा पर निर्भर हो गई है। राहुल गांधी ने लालू यादव के सामने अपने को सरेंडर कर दिया है, जबकि कांग्रेस नेता भले ही जोशीले बयान देते रहें, असल में उनकी स्थिति कमजोर हो चुकी है।
कृष्णा अल्लावरु का स्थान और कांग्रेस का भविष्य
बिहार में कांग्रेस की भूमिका अब वैसी नहीं रही जैसी पहले थी। कृष्णा अल्लावरु को अब बलि का बकरा माना जा रहा है, जिनकी भूमिका सैम पित्रोदा (Sam Pitroda) जैसी हो गई है। महागठबंधन की प्रेस कॉन्फ्रेंस में कृष्णा अल्लावरु चुपचाप बैठे रहे, जबकि कांग्रेस के कुछ नेता विरोध प्रदर्शन कर रहे थे। वीडियो में देखा गया कि कांग्रेस नेता टिकटों को लेकर नाराजगी जता रहे थे, और राहुल गांधी के ‘वोट चोर गद्दी छोड़’ नारे का जवाब दे रहे थे।
कृष्णा अल्लावरु का कार्यकाल और युवा नेतृत्व
कृष्णा अल्लावरु से यूथ कांग्रेस का प्रभार ले लिया गया है, और मध्य प्रदेश से मनीष शर्मा को नया प्रभारी बनाया गया है। यह कदम कांग्रेस के अंदरूनी असंतोष और नेतृत्व परिवर्तन का संकेत है। बिहार चुनाव से पहले राहुल गांधी ने वोटर अधिकार यात्रा का ऐलान किया था, लेकिन वह भी अब कमजोर पड़ती जा रही है। प्रियंका गांधी भी बिहार में रैलियों की योजना बनाते-बनाते वापस लौट आईं।
चुनावी रणनीति का मॉक ड्रिल साबित होना
बिहार चुनाव में कांग्रेस की तमाम कोशिशें अब एक मॉक ड्रिल जैसी लग रही हैं। क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस के स्टैंड और रणनीति में असमंजस स्पष्ट हो चुका है। यह सबक राहुल गांधी और उनकी टीम के लिए बड़ा है कि क्षेत्रीय समीकरणों को समझना और मजबूत करना कितना जरूरी है।










