बिहार की राजनीति में बड़े बदलाव की योजना का इतिहास
बिहार की राजनीतिक दिशा में बड़े बदलाव की पटकथा अचानक नहीं लिखी गई, बल्कि इसकी तैयारी कई वर्षों से चल रही थी। सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सम्मानजनक विदाई का रोडमैप 2020 के विधानसभा चुनाव के तुरंत बाद ही तैयार हो गया था, और समय के साथ इसे चरणबद्ध तरीके से लागू किया गया। 2020 के चुनाव में जेडीयू को केवल 43 सीटें मिलीं, जिसके बाद नीतीश कुमार खुद मुख्यमंत्री पद के इच्छुक नहीं थे। उस समय भाजपा के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने उनसे कहा कि चुनाव उनके नाम पर लड़ा गया है, इसलिए मुख्यमंत्री पद उन्हें ही संभालना होगा।
नीतीश की विदाई और राजनीतिक रणनीति का विस्तार
तब यह तय हुआ कि कुछ समय बाद नीतीश की इच्छा के अनुसार उन्हें सम्मानजनक तरीके से सक्रिय राजनीति से अलग कर दिया जाएगा। सूत्र बताते हैं कि दिल्ली के दौरों के दौरान नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से भी इस विषय पर चर्चा की थी। धीरे-धीरे संकेत मिलने लगे—2025 के बाद गृह विभाग का भाजपा के पास जाना, जेडीयू के भीतर सत्ता का संतुलन बदलना और भाजपा नेताओं का मजबूत होना। इस बीच, भाजपा ने रणनीतिक रूप से सम्राट चौधरी को उपमुख्यमंत्री बनाकर नीतीश के साथ साये की तरह रखा।
नीतीश की वापसी और बिहार में राजनीतिक बदलाव
नीतीश कुमार ने राज्यसभा की ओर कदम बढ़ाए, जिससे बिहार राजनीति में एक युग का अंत माना जा रहा है। उनके फैसले पर कार्यकर्ताओं ने प्रदेश अध्यक्ष उमेश कुशवाहा का घेराव कर अपनी नाराजगी जाहिर की। नीतीश का उद्देश्य 2024 के लोकसभा चुनाव में फायदा उठाना और अपने सामाजिक आधार वोट बैंक को बनाए रखना था। उनकी सेहत में गिरावट के साथ ही जेडीयू के कई शीर्ष नेताओं की नजदीकियां भाजपा से बढ़ने लगीं। ललन सिंह के केंद्रीय मंत्री बनने और संजय झा को कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पार्टी के भीतर सत्ता का केंद्र बदलता दिखा। सूत्रों के अनुसार, लगभग दो महीने पहले ही नीतीश के एग्जिट प्लान को अंतिम रूप दिया गया था, जिसमें उनके बेटे निशांत कुमार को राजनीति में लाने की चर्चाएं तेज हुईं। राज्यसभा चुनाव की घोषणा के बाद उन्हें स्पष्ट संदेश भेजा गया कि उन्हें उच्च सदन में भेजा जाएगा। पार्टी और परिवार के कई लोगों ने उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन नीतीश का जवाब था—”मैंने भाजपा से वादा कर दिया है।” उनके राज्यसभा जाने के साथ ही बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री बनने का रास्ता साफ माना जा रहा है।










