बिहार में सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है, और अब केवल औपचारिक घोषणा का इंतजार है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपनी अंतिम कैबिनेट बैठक 14 अप्रैल को करेंगे, जिसके बाद वे अपने इस्तीफे को राज्यपाल को सौंप सकते हैं। यह कदम बिहार की राजनीति में लंबे समय से चले आ रहे ‘नीतीश युग’ के अंत का संकेत है, जिससे राज्य की राजनीतिक दिशा और दशा पूरी तरह से बदलने वाली है।
पिछले दो दशकों से नीतीश कुमार बिहार की सत्ता के केंद्र में रहे हैं, और उनके इर्द-गिर्द ही सियासत का पूरा खेल चलता रहा है। हालांकि, अब जब वे दिल्ली की राजनीति में सक्रिय हो गए हैं और अपने राज्यसभा सदस्य पद की शपथ ले चुके हैं, तो बिहार की राजनीतिक परिदृश्य में बदलाव की संभावना बढ़ गई है। इस बदलाव के साथ ही बिहार में नई राजनीतिक गठबंधन और समीकरण बन सकते हैं, जिसमें जेडीयू की भूमिका कम हो सकती है।
बिहार में सत्ता की बागडोर अब भाजपा के हाथ में आने की संभावना है, जो पहले जूनियर पार्टनर की भूमिका में थी। इससे बिहार की सियासत में नया समीकरण बन सकता है, जिसमें जेडीयू का प्रभाव कम हो सकता है। विपक्ष में तेजस्वी यादव सबसे मजबूत नेता के रूप में उभर सकते हैं, क्योंकि भाजपा अब बिहार में मुख्य शक्ति बन जाएगी। इस बदलाव के साथ ही बिहार की राजनीति में द्विध्रुवीय मुकाबला तेज हो सकता है, जिसमें भाजपा और आरजेडी के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल सकती है।










