बिहार की राजनीति में बाहुबली नेताओं का प्रभाव
पिछले तीन दशकों से बिहार की राजनीतिक दिशा बाहुबलियों के प्रभाव के इर्दगिर्द घूमती रही है। जिस पार्टी के पास अधिक बाहुबली नेता होते हैं, उसकी सरकार बनाने की संभावना भी उतनी ही मजबूत मानी जाती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, जिन्हें आज के समय में सुशासन बाबू के नाम से जाना जाता है, ने अपने राजनीतिक करियर में कई बार माफियाओं का समर्थन लिया है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में अधिकांश राजनीतिक दल यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे माफिया से दूरी बनाए हुए हैं।
नीतीश कुमार का माफिया नेताओं से रिश्ता
नीतीश कुमार ने जब सुशासन की छवि बनाई थी, तब उन्होंने माफिया नेताओं से दूरी बनाने का प्रयास किया। लेकिन इस बार के विधानसभा चुनावों में, उनके द्वारा माफिया नेताओं को टिकट देने से स्पष्ट हो गया है कि उनका भरोसा टूट चुका है। 2020 के चुनाव में जेडीयू को बीजेपी (BJP) और आरजेडी (RJD) के मुकाबले कम सीटें मिली थीं, जिससे यह संकेत मिलता है कि माफिया नेताओं का समर्थन ही उनके लिए जरूरी हो गया है।
माफिया नेताओं को टिकट देने का कारण
आरजेडी, जो पहले बदनाम रही है, तेजस्वी यादव के नेतृत्व में कुछ हद तक माफिया से दूरी बनाने की कोशिश कर रही थी। लेकिन सफलता न मिलने पर, पार्टी भी माफिया नेताओं को अपने साथ जोड़ने लगी है। अब सवाल उठता है कि जब जेडीयू खुद अनंत सिंह जैसे माफिया नेता को मोकामा से टिकट दे रही है, तो वह आरजेडी के माफिया नेताओं को कैसे निशाना बना सकती है? जेडीयू ने अपनी पहली सूची में तीन बाहुबली नेताओं को मौका दिया है, जिनमें अनंत सिंह, धूमल सिंह और अमरेन्द्र पांडेय शामिल हैं। संभव है कि दूसरी सूची में और भी कई नाम देखने को मिलें।
बिहार में बाहुबली नेताओं का चुनावी खेल
बिहार में बाहुबली नेताओं का प्रभाव केवल चुनावी मैदान तक ही सीमित नहीं है, बल्कि ये वोटरों को प्रभावित करने, बूथ कैप्चरिंग रोकने और स्थानीय विवादों को सुलझाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं। 2025 के बिहार विधानसभा चुनावों में, जेडीयू ने 101 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारने का फैसला किया है, जिनमें से अभी तक तीन बाहुबली नेताओं को टिकट मिला है। माना जा रहा है कि और भी कई बाहुबली परिवारों के सदस्य इस सूची में शामिल हो सकते हैं।
बाहुबली नेताओं का चुनाव रणनीति में स्थान
जेडीयू की यह रणनीति, जिसमें बाहुबली नेताओं को टिकट देना, महागठबंधन के प्रभाव को चुनौती देने का प्रयास है, बिहार की राजनीति में नई दिशा दिखाती है। यह कदम उन प्रभावशाली नेताओं को मैदान में उतारने का है, जो क्षेत्रीय राजनीति में अपनी पकड़ बनाए हुए हैं। जैसे पप्पू यादव, अशोक महतो, भाई वीरेन्द्र और चंद्रशेखर प्रसाद जैसे नेता, जिनके प्रभाव को काउंटर करने के लिए जेडीयू अपने बाहुबली उम्मीदवारों को मैदान में उतार रही है।
अनंत सिंह का राजनीतिक उदय और प्रभाव
मोकामा से जेडीयू के उम्मीदवार अनंत सिंह का राजनीतिक सफर बिहार की ग्रामीण राजनीति का प्रतीक है। 1969 में मुंगेर जिले के लदमा गांव में जन्मे अनंत सिंह ने 1990 के दशक में अपराध की दुनिया में कदम रखा। उनके बड़े भाई दिलीप सिंह, जो आरजेडी से विधायक रहे, ने उन्हें राजनीतिक रूप से स्थापित किया। अनंत सिंह की ताकत उनके ‘छोटे सरकार’ वाले छवि में है, जो अपराध और राजनीति के मेल से बनी है। मोकामा जैसे क्षेत्र में, जहां अपराध का स्तर ऊंचा है, वे स्थानीय जनता के मसीहा माने जाते हैं।
बिहार में बाहुबली राजनीति का भविष्य
बिहार में बाहुबली नेताओं को टिकट देना, एक रणनीतिक कदम है, जो महागठबंधन के प्रभाव को चुनौती देने और एनडीए (NDA) को मजबूत बनाने का प्रयास है। यह चुनाव परिणाम ही बताएंगे कि क्या यह रणनीति सफल होगी। अनंत सिंह जैसे बाहुबली नेताओं का चुनावी मैदान में उतरना, जेडीयू की राजनीति में नई जटिलताएं खड़ी कर सकता है। उनके समर्थक बड़े पैमाने पर रोड शो कर रहे हैं और वोटरों को प्रभावित करने का प्रयास कर रहे हैं।
बाहुबली नेताओं का वोट बैंक और चुनावी प्रभाव
अनंत सिंह जैसे बाहुबली नेताओं का वोट बैंक खासा मजबूत माना जाता है। उनके समर्थक हजारों वाहनों के रोड शो कर, अपने नेता के समर्थन में उत्साह दिखा रहे हैं। माना जा रहा है कि जेडीयू और बीजेपी मिलकर इन बाहुबली नेताओं को मैदान में उतारकर अपने वोट बैंक को मजबूत कर सकते हैं। इससे क्षेत्रीय राजनीति में नई समीकरण बन सकते हैं, जो बिहार की चुनावी राजनीति का भविष्य तय करेंगे।











