बिहार में दही-चूड़ा भोज की परंपरा का ऐतिहासिक महत्व
बिहार में दही-चूड़ा भोज की परंपरा का इतिहास लालू प्रसाद यादव (Lalu Prasad Yadav) के समय से जुड़ा हुआ है, जिन्होंने 90 के दशक में इसे देशी डिनर डिप्लोमेसी का रूप दिया था। इस परंपरा का उद्देश्य राजनीतिक मेलजोल और सत्ता समीकरणों को मजबूत बनाना था। उस समय लालू यादव ने अपने समर्थकों और नेताओं के बीच इस भोज का आयोजन किया, जिसमें जॉर्ज फर्नांडीस (George Fernandes) और नीतीश कुमार (Nitish Kumar) जैसे नेताओं ने भाग लिया। यह आयोजन बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में देखा जाता है, जो सत्ता परिवर्तन के संकेत भी देता रहा है।
राजनीतिक परंपरा और बदलाव की दिशा में कदम
लालू यादव के मुख्यमंत्री रहते हुए दो दिवसीय दही-चूड़ा भोज की शुरुआत हुई, जिसमें पहले दिन नेताओं और कार्यकर्ताओं को आमंत्रित किया जाता था, और दूसरे दिन झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले समर्थकों को। इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जेडीयू (JDU) के वशिष्ठ नारायण सिंह और रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) जैसे नेताओं ने इसे राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया। 2015 में रामविलास पासवान ने दिल्ली में भव्य दही-चूड़ा भोज का आयोजन किया, जिसमें नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) जैसे भाजपा (BJP) नेताओं ने भाग लिया। इन आयोजनों का उद्देश्य बिहार में राजनीतिक गठबंधन और सत्ता के समीकरणों को मजबूत करना रहा है।
सामाजिक और राजनीतिक संकेतों का मेल
2017 में जब नीतीश कुमार (Nitish Kumar) ने महागठबंधन की सरकार बनाई, तो उन्होंने भी दही-चूड़ा भोज में भाग लिया। उस समय लालू यादव ने नीतीश कुमार को दही का टीका लगाया और कहा कि यह बीजेपी के जादू टोने से बचाने के लिए है। हालांकि कुछ महीनों बाद ही नीतीश कुमार ने लालू यादव का साथ छोड़कर भाजपा (BJP) का समर्थन कर लिया। लालू यादव ने अपने जेल जीवन के दौरान भी इस परंपरा का इस्तेमाल अपनी राजनीतिक रणनीति के रूप में किया। 2018 में लालू यादव ने जमानत पाने के लिए भी इस भोज का सहारा लिया, जहां उन्होंने कहा कि यदि जमानत नहीं मिली तो दही-चूड़ा कैसे देंगे। इस तरह, बिहार में दही-चूड़ा भोज का राजनीतिक महत्व और संकेतों का मेल सदैव चर्चा का विषय रहा है।









