बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार का अचानक कदम
बिहार की राजनीतिक दुनिया में गुरुवार का दिन एक ऐतिहासिक और भावुक मोड़ लेकर आया, जब लंबे समय से सत्ता के शीर्ष पर बने ‘सुशासन बाबू’ यानी नीतीश कुमार ने अचानक राज्यसभा जाने का फैसला किया। इस फैसले के बाद पार्टी कार्यालय में तोड़फोड़ हुई, मुख्यमंत्री आवास के बाहर समर्थकों का जमावड़ा लगा, जिससे पार्टी के विधायक और मंत्री भी अंदर नहीं जा सके और उन्हें भागना पड़ा।
इस घटना के तुरंत बाद डीजीपी को मौके पर उतरना पड़ा और मुख्यमंत्री आवास की सुरक्षा को मजबूत किया गया। लेकिन असली राजनीतिक जज़्बे का प्रदर्शन शुक्रवार शाम को देखने को मिला, जब जेडीयू (Janata Dal United) की विधानमंडल दल की बैठक हुई। यह बैठक केवल राजनीतिक चर्चा का मंच नहीं थी, बल्कि एक भावुक विस्फोट का साक्षी बनी, जिसने अनुभवी नेता नीतीश कुमार को भी चुप करा दिया।
विधायकों का दर्द और भावुकता का माहौल
जैसे ही बैठक शुरू हुई और नीतीश कुमार ने अपने राज्यसभा जाने और बिहार की कमान सौंपने का संकेत दिया, पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। विधायक विनय चौधरी ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि वरिष्ठ नेता विजेंद्र यादव ने विधायकों से कहा कि यदि सच कड़वा है, तो वे बोलेंगे। यह सुनते ही कई विधायकों की आंखों से आंसू निकल पड़े। विनय चौधरी खुद को संभाल नहीं सके और रो पड़े। उन्होंने कहा कि पहले जब हम विधानसभा में नीतीश कुमार का स्वागत गुलदस्ते के साथ करते थे, अब वह गुलदस्ता किसे देंगे? आपने सब कुछ खत्म कर दिया।
यह दर्द केवल नेता के जाने का नहीं था, बल्कि उस भरोसे के टूटने का था, जो पिछले 20 वर्षों से बिहार की राजनीति का आधार रहा है। विधायकों ने कहा कि वे नीतीश और निशांत (Nishant) को साथ देखना चाहते हैं, न कि एक के जाने के बाद दूसरे को। विधायकों ने यह भी मांग की कि यदि नीतीश कुमार दिल्ली जा रहे हैं, तो उन्हें अपनी विरासत के रूप में निशांत को सौंप दिया जाए।
राजनीतिक दबाव और बिहार की सियासत का नया दौर
सूत्रों के अनुसार, जेडीयू (JDU) के अंदर चर्चा है कि केंद्रीय बीजेपी (BJP) के नेतृत्व, खासकर गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) के दखल के बाद यह सियासी फॉर्मूला तय हुआ कि सत्ता का हस्तांतरण किया जाए। चुनावी नतीजों के बाद बीजेपी बिहार में अपना मुख्यमंत्री चाहती थी। अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि नीतीश कुमार इस दबाव के आगे झुके जरूर हैं, लेकिन मन से तैयार नहीं थे। इसी कारण जेडीयू के कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आए और नेताओं के खिलाफ सौदेबाजी के आरोप लगाए। उन्हें विभीषण तक कहा गया।
विशेषज्ञ मानते हैं कि नीतीश कुमार का राज्यसभा जाना बिहार के लिए एक स्वर्ण युग के अंत जैसा है। उन्होंने बीजेपी के साथ रहते हुए भी बिहार को सांप्रदायिक ध्रुवीकरण से बचाया और भ्रष्टाचार, अपराध, और सांप्रदायिकता से समझौता नहीं किया। अब सवाल है कि बीजेपी का नया मुख्यमंत्री क्या नीतीश के उस ‘सेकुलर-समाजवादी’ ढांचे को कायम रख पाएगा।
नीतीश कुमार ने विधायकों को भरोसा दिलाया है कि वे हैं, चिंता मत करें, लेकिन उनके आंसू और कार्यकर्ताओं का गुस्सा यह दर्शाता है कि बिहार की जनता इस ‘अचानक विदाई’ को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। सवाल है कि क्या निशांत कुमार अपने पिता की विरासत को उसी मजबूती से संभाल पाएंगे और बिहार में वह ‘सुशासन’ फिर से लौट सकेगा, जैसा नीतीश कुमार ने दिखाया था।









