बिहार चुनाव में सीट शेयरिंग की जटिलताएँ और छोटे दलों का प्रभाव
बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान सभी प्रमुख राजनीतिक दल अपनी जीत की संभावना के आधार पर सीटों का बंटवारा कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में राजनीतिक ताकत और वोट बैंक का महत्व स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आ रहा है। एनडीए (NDA) और महागठबंधन दोनों ही अपने-अपने गठबंधन में सीटों का वितरण तय कर चुके हैं, लेकिन छोटे दलों की भूमिका और उनकी मांगें चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर रही हैं।
एनडीए का सीट शेयरिंग फॉर्मूला और छोटी पार्टियों की मांगें
एनडीए में सबसे बड़ा घटक भारतीय जनता पार्टी (BJP) बिहार विधानसभा में अपनी प्रमुख भूमिका निभा रही है। इसके साथ ही, नीतीश कुमार की अगुवाई वाली जनता दल (यूनाइटेड) भी सरकार का नेतृत्व कर रही है। इन दोनों दलों के साथ चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (LJP R) और जीतनराम मांझी की हम पार्टी भी गठबंधन का हिस्सा हैं।
उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी 10 से 12 सीटों की मांग कर रही है, जबकि चिराग पासवान की पार्टी 43 से अधिक सीटें चाहती है। एलजेपीआर के सांसद राजेश वर्मा ने कहा था कि 2020 का चुनाव अकेले लड़ा था, और इस बार भी बिना किसी समस्या के चुनाव लड़ने का इरादा है। वहीं, जीतनराम मांझी की पार्टी 15 सीटों की मांग कर रही है।
एनडीए का संभावित सीट शेयरिंग फॉर्मूला इस प्रकार है कि बीजेपी और जेडीयू मिलकर 205 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। इसके अलावा, चिराग पासवान को 25, जीतनराम मांझी को सात और उपेंद्र कुशवाहा को छह सीटें दी जाने की संभावना है।
विपक्षी महागठबंधन की सीटों की मांग और दलों की रणनीतियाँ
विपक्षी महागठबंधन में शामिल दल अपनी-अपनी सीटों की मांग कर रहे हैं। मुकेश सहनी की नेतृत्व वाली विकासशील इंसान पार्टी कम से कम 40 सीटों की डिमांड कर रही है, और यदि उन्हें डिप्टी सीएम का पद भी दिया जाए तो वे मानने को तैयार हैं। इस दल की कुछ सीटें ऐसी हैं जहां आरजेडी (RJD), कांग्रेस और लेफ्ट के विधायक भी हैं।
लेफ्ट पार्टियों की भी अपनी मांगें हैं। वे कम से कम 30 सीटों पर चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं और अपनी फाइनल लिस्ट भी महागठबंधन को सौंप चुके हैं। इन दलों का वोट शेयर लगभग 4.6 प्रतिशत है, जो बिहार में चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकता है।
विपक्षी गठबंधन में शामिल दलों की इन मांगों और सीटों के बंटवारे का फैसला अभी भी फंसा हुआ है, जिससे चुनावी रणनीति और परिणाम पर असर पड़ सकता है।
छोटे दलों का वोट बैंक और चुनावी प्रभाव
बिहार में छोटे दलों का वोट बैंक खासतौर पर जातीय आधार पर मजबूत है। चिराग पासवान की पार्टी का मुख्य आधार पासवान समुदाय है, जिसकी आबादी लगभग 69 लाख 43 हजार है। यह जाति बिहार की कुल आबादी का करीब 5.31 प्रतिशत हिस्सा है। हालांकि, अकेले इस वोट बैंक से किसी दल का पूर्ण जीतना संभव नहीं है, लेकिन यह गठबंधन के जीतने की संभावनाओं को बढ़ा सकता है।
वहीं, जीतनराम मांझी की पार्टी महादलित वोट बैंक पर भरोसा कर रही है, जिसमें बिहार की कुल आबादी का लगभग 14 प्रतिशत हिस्सा शामिल है। मांझी की जाति मुसहर की आबादी सूबे में करीब 3.09 प्रतिशत है, और उनका प्रभाव गया जिले समेत आसपास के क्षेत्रों में माना जाता है। 2020 के चुनाव में उनकी पार्टी ने चार सीटें जीती थीं।
मुकेश सहनी की पार्टी का प्रभाव मुख्य रूप से दरभंगा और बिहार के तटीय इलाकों में देखा जाता है, जहां मल्लाह जाति का वोट बैंक निर्णायक भूमिका निभाता है। इन छोटे दलों का वोट बैंक चुनावी परिणामों को प्रभावित कर सकता है, खासकर जब मुकाबला करीबी हो।









