बिहार विधानसभा चुनाव में जातीय समीकरणों का प्रभाव
बिहार के विधानसभा चुनावों में प्रचार अभियान तेज हो चुका है, जहां राजनीतिक दल विभिन्न मुद्दों के साथ ही जातीय समीकरणों पर भी ध्यान केंद्रित कर रहे हैं। इन समीकरणों का चुनाव परिणामों पर गहरा असर पड़ने की संभावना है। पार्टियां अपनी-अपनी जातियों को खुश करने का प्रयास कर रही हैं, वहीं कुछ नेताओं को टिकट न मिलने से नाराजगी भी देखने को मिल रही है। खासतौर पर राजधानी पटना की कुम्हरार विधानसभा सीट पर यह जातीय संघर्ष स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है।
कुम्हरार सीट पर जातीय संघर्ष और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
पटना की कुम्हरार विधानसभा सीट पर मुकाबला दिलचस्प मोड़ ले चुका है। इस सीट पर पिछले दो दशकों से भारतीय जनता पार्टी (BJP) का कब्जा रहा है। इस बार बीजेपी ने पूर्व विधायक अरुण सिन्हा का टिकट काटकर संजय कुमार गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। अरुण सिन्हा कायस्थ समुदाय से हैं, जबकि संजय गुप्ता वैश्य समुदाय से। बिहार जैसे राज्य में जहां जाति राजनीति का वर्चस्व है, वहां बीजेपी का कायस्थ समुदाय को छोड़कर वैश्य उम्मीदवार उतारना जातीय अस्मिता से जुड़ा एक बड़ा मुद्दा बन गया है। इस सीट पर बीजेपी को कायस्थ समुदाय की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है।
कायस्थ समुदाय की नाराजगी और चुनावी समीकरण
कुम्हरार क्षेत्र में कुल 4 लाख 20 हजार मतदाता हैं, जिनमें से लगभग 70 हजार कायस्थ मतदाता हैं। यह समुदाय पारंपरिक रूप से बीजेपी का मजबूत वोटर रहा है, लेकिन इस बार वह उपेक्षा का आरोप लगाकर नाराज हो रहा है। कायस्थ समुदाय का मानना है कि उन्हें राजनीतिक रूप से नजरअंदाज किया जा रहा है। हालांकि बीजेपी का दावा है कि कायस्थ समाज पूरी तरह से उनके साथ है और पूर्व विधायक अरुण सिन्हा का समर्थन भी उन्हें प्राप्त है। बिहार बीजेपी के कायस्थ चेहरे और मंत्री नितिन नवीन ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि समाज बीजेपी के साथ खड़ा है।
प्रचार और उम्मीदवारों की राजनीतिक रणनीति
कुम्हरार सीट की चुनावी जंग में अब जातीय अस्मिता का रंग चढ़ चुका है। इस बार जन सुराज पार्टी ने गणितज्ञ प्रोफेसर केसी सिन्हा को अपना उम्मीदवार बनाया है। प्रोफेसर सिन्हा ने कहा है कि वह जाति के बजाय शिक्षा और समाज के विकास पर वोट मांगेंगे। उन्होंने यह भी दावा किया कि उनके कई छात्र पूरे बिहार में फैले हैं और वह जाति के नाम पर वोट नहीं मांगते। हालांकि, इस उम्मीदवार को भी कायस्थ समुदाय की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। बीजेपी और अन्य दलों की रणनीतियों के बीच यह सीट जातीय समीकरणों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है।









