बिहार में विधानसभा चुनाव का दूसरा और अंतिम चरण मंगलवार को मतदान के साथ शुरू हो गया है। इस चरण में कुल 20 जिलों की 122 सीटों पर चुनावी प्रक्रिया चल रही है, जिसमें 1302 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। इस फेज में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के 12 मंत्रियों की साख दांव पर लगी है, साथ ही कई अनुभवी नेता भी मैदान में हैं, जो खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन उनके लिए यह परीक्षा बेहद महत्वपूर्ण है।
बिहार की महत्वपूर्ण सीटों पर चुनावी मुकाबला और सियासी समीकरण
इस चरण में कुल 122 सीटों में से 101 सामान्य वर्ग की हैं, जबकि 19 अनुसूचित जाति और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। इन सीटों का परिणाम बिहार की सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाएगा। चुनावी मैदान पर मिथिलांचल, सीमांचल, चंपारण और शाहाबाद-मगध जैसे इलाकों में मुकाबला तेज है। सीमांचल क्षेत्र में असदुद्दीन ओवैसी और पूर्णिया के सांसद पप्पू यादव की साख दांव पर लगी है, वहीं शाहाबाद में उपेंद्र कुशवाहा का सियासी इम्तिहान है। गयाजी क्षेत्र में एनडीए के सहयोगी जीतनराम मांझी के लिए यह किसी परीक्षा से कम नहीं है।
सीमांचल और अन्य प्रमुख उम्मीदवारों का सियासी संघर्ष
2020 के चुनाव में सीमांचल की पांच सीटें AIMIM (असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी) ने जीतकर हलचल मचा दी थी, जिनमें से चार नेता बाद में आरजेडी (RJD) में शामिल हो गए। इस बार ओवैसी ने बिहार की 25 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं, जिनमें से 8 पहले चरण में चुनाव लड़ चुके हैं और अब 17 सीटों पर मुकाबला जारी है। सीमांचल की 15 सीटों पर AIMIM के उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, जबकि दो सीटें चंपारण की हैं। ओवैसी की चुनौती इस बार सीमांचल में अपने नतीजे दोहराने की है, क्योंकि मुस्लिम वोटरों का समर्थन उनके सियासी भविष्य के लिए अहम माना जा रहा है। कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने भी मुस्लिम वोटों को प्रभावित करने के लिए अपने उम्मीदवार उतारे हैं।
वहीं, पूर्णिया से सांसद पप्पू यादव का सियासी दांव भी इस चरण में फंसा है। भले ही वह खुद चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन उनके समर्थक और उनके नाम पर चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों का प्रदर्शन उनके राजनीतिक कद का संकेत देगा। कांग्रेस का सारा दारोमदार इस चरण की सीटों पर टिका है, जहां 37 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं। पिछली बार के खराब प्रदर्शन के कारण कांग्रेस को सियासी झटका लगा था, और इस बार भी उसकी स्थिति चुनौतीपूर्ण है।
आरएलएम (राष्ट्रीय ग्रामीण जीवन मिशन) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे हैं, लेकिन उनकी साख भी दांव पर लगी है। उन्होंने अपनी पत्नी स्नेहलता को सासाराम सीट से मैदान में उतारा है, जहां से वह मुकाबला कर रही हैं। यदि वे अपनी कोटे की चारों सीटें नहीं जीत पाते हैं, तो उनका राजनीतिक प्रभाव कमजोर हो सकता है।
एनडीए के सहयोगी और मोदी सरकार में मंत्री जीतनराम मांझी की पार्टी HAM का भी इस चरण में सटीक परीक्षा है। उनके छह उम्मीदवार इस बार चुनाव लड़ रहे हैं, जिनमें से चार सीटें उनके परिवार के सदस्य लड़ रहे हैं। इन सीटों पर मुकाबला मुख्य रूप से राजद (RJD) और कांग्रेस के उम्मीदवारों के बीच है। देखना होगा कि मांझी अपने समर्थकों के साथ इस सियासी परीक्षा में कितने सफल होते हैं।










