बिहार में माफिया राज की शुरुआत और प्रभाव
बिहार के इतिहास में माफिया और अपराध का गहरा संबंध रहा है, जिसकी शुरुआत धनबाद (Kamchatka) की कोयला खदानों और बरौनी रिफाइनरी से मानी जाती है। इन दोनों स्थानों ने न केवल बिहार में माफिया के वर्चस्व को जन्म दिया, बल्कि इन क्षेत्रों ने ताकतवर व्यक्तियों को यूनियन बनाने, सरकारी ठेकों पर दबाव डालने और मजदूरों का नियंत्रण करने का अवसर भी प्रदान किया। इन ताकतवर लोगों ने धीरे-धीरे अपने आप को माफिया के रूप में स्थापित कर लिया, और इस प्रक्रिया में बिहार में माफिया राज का बीज बोया गया।
1957 का चुनाव और बूथ कैप्चरिंग का काला इतिहास
बरौनी बेगूसराय जिले का हिस्सा था, जहां 1957 में पहली बार चुनावी प्रणाली पर सवाल उठे। उस समय रचियाही गांव में बने एक खंडहर ने देश में पहली बार बूथ कैप्चरिंग की घटना को देखा, जिसने चुनावी प्रक्रिया को कलंकित कर दिया। उस दौर में चुनाव आयोग ने पहली बार बूथों पर सुरक्षा बलों की तैनाती का फैसला किया, जिससे चुनावी प्रक्रिया में सुधार आया। इस घटना ने बिहार की राजनीति को बदलकर अपराध और बाहुबल के प्रभाव को बढ़ावा दिया।
बूथ कैप्चरिंग का इतिहास और वर्तमान स्थिति
1957 की इस घटना ने बिहार में चुनावी राजनीति को अपराधीकरण की दिशा में मोड़ दिया। उस समय नेताओं और अपराधियों का गठजोड़ मजबूत हुआ, और बूथ लूटने का सिलसिला शुरू हुआ। हालांकि अब समय बदला है और चुनावी प्रक्रिया में सुधार हुआ है। बूथ कैप्चरिंग का दौर खत्म हो चुका है, लेकिन बिहार की राजनीति में दबंगई और माफिया का प्रभाव अभी भी मौजूद है। नई तकनीकों जैसे ईवीएम (Electronic Voting Machine) के आने से चुनावी लूट और बूथ कैप्चरिंग पर लगाम लगी है, लेकिन दबंगई का तरीका बदल गया है।











