बिहार की क्राइम इतिहास: अपराध का गहरा जड़ें जमाना
बिहार की धरती पर अपराध का इतिहास सदियों पुराना है, जहां खून-खराबा, सत्ता की लालसा और बंदूक की धमक हमेशा से आम बात रही है। स्वतंत्रता के बाद से लेकर वर्तमान तक, इस प्रदेश में गैंगस्टर्स ने अपने वर्चस्व को मजबूत करने के लिए अपहरण, हत्या और राजनीतिक संरक्षण का सहारा लिया है। कुख्यात अपराधियों जैसे कामदेव सिंह से लेकर मोहम्मद शहाबुद्दीन तक, हर बाहुबली ने जंगलराज की नई परिभाषा लिखी। यह कहानी उन माफियाओं की है, जिन्होंने बूथ कैप्चरिंग से लेकर साइबर क्राइम तक का सफर तय किया। बिहार का यह काला इतिहास आज भी खौफनाक है, जहां अपराधी विधायक बनते हैं और विधायक अपराधी। आइए, इस खौफनाक क्राइम कथा के पन्नों को खोलते हैं।
प्रारंभिक दौर: जातीय वर्चस्व और अपराध का जन्म
1947 के बाद बिहार में अपराध का बीज बोया गया, जब जातीय वर्चस्व और आर्थिक असमानता ने हिंसक संघर्ष की शुरुआत की। बंटवारे के बाद ग्रामीण इलाकों में भूमिहार और राजपूत समुदायों के बीच छोटे-मोटे विवाद हिंसक रूप ले चुके थे। बेगूसराय जैसे जिलों में तस्करी और डकैती का सिलसिला शुरू हो चुका था, जहां स्थानीय जमींदारों ने अपने हितों की रक्षा के लिए गुंडों को संरक्षण दिया। इस दौर में कामदेव सिंह जैसे अपराधी उभर कर सामने आए, जिन्होंने 1930 में जन्म लिया और 1950 तक कई छोटे-मोटे अपराधों में शामिल हो चुके थे। उस समय राजनीतिक अस्थिरता और पुलिस की कमजोरी ने अपराधियों को बेखौफ होने का मौका दिया, जिससे बिहार में जंगलराज की शुरुआत हुई। 1952 के पहले विधानसभा चुनावों में बूथ कैप्चरिंग की शुरुआत हुई, जो बाद में गैंगस्टर्स के हथियार बन गई।
बिहार का माफिया युग: राजनीतिक संरक्षण और अपराध का विस्तार
1950 के दशक में कामदेव सिंह ने बेगूसराय में अपने अपराध का साम्राज्य स्थापित किया, जो डकैती, तस्करी और राजनीतिक हिंसा पर आधारित था। भूमिहार परिवार से ताल्लुक रखने वाले इस अपराधी ने कम्युनिस्ट विरोधी अभियान चलाए और कांग्रेस समर्थक नेताओं के लिए बूथ कैप्चरिंग का काम किया। 1957 के विधानसभा चुनाव में उसने 34 बूथ कब्जाए, जिससे उसके संरक्षक सूर्युग प्रसाद सिंह की जीत सुनिश्चित हुई। स्थानीय लोग उसे ‘सम्राट’ और ‘रोबिन हुड’ के नाम से जानते थे, क्योंकि वह गरीबों की शादियों और अंतिम संस्कार का खर्च उठाता था। लेकिन उसकी क्रूरता भी कुख्यात थी, उसने नेपाल से लेकर कलकत्ता तक स्मगलिंग नेटवर्क का संचालन किया। 1960 तक उसका वर्चस्व बिहार के उत्तरी जिलों तक फैल चुका था, जहां उसने गुंडों की फौज खड़ी कर दी थी। इस दौर में अपराध का राजनीतिकरण शुरू हुआ, और गैंगस्टर्स चुनावी राजनीति का हिस्सा बन गए।









