बिहार में इथेनॉल उद्योग का संकट गहरा रहा है
बिहार में स्थापित 14 डेडिकेटेड इथेनॉल (DEP) संयंत्रों के भविष्य पर अब गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। केंद्र सरकार की नई इथेनॉल नीति के तहत तेल विपणन कंपनियों (OMC) द्वारा इथेनॉल की खरीद सीमा को 50 प्रतिशत तक सीमित कर देने का निर्णय बिहार के इस उद्योग पर सीधे प्रभाव डाल रहा है। परिणामस्वरूप, राज्य के कई इथेनॉल संयंत्र अपनी पूरी क्षमता के बजाय सीमित मात्रा में ही उत्पादन कर रहे हैं। सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण का लक्ष्य घोषित किया था, जिस पर बड़े निवेश भी किए गए थे, लेकिन वर्तमान में इस लक्ष्य की प्राप्ति लगभग असंभव सी लग रही है।
बिहार में इथेनॉल खरीद में कटौती और उद्योग संकट
यह ध्यान देना जरूरी है कि इथेनॉल का खुले बाजार में कोई स्वतंत्र व्यापार नहीं होता है। जब भी इसकी बिक्री होती है, तो तेल कंपनियां ही इसे खरीदती हैं। जानकारी के अनुसार, 2022 में तेल कंपनियों ने बिहार में तय किया था कि आने वाले दस वर्षों तक, जितना भी इथेनॉल उत्पादन होगा, उसकी 100 प्रतिशत खरीदारी वे ही करेंगी। बिहार के उद्योग मंत्री ने इस संकट को लेकर कहा है कि वे जल्द ही केंद्र सरकार से मिलकर इस मुद्दे को उठाएंगे ताकि बिहार में स्थापित इथेनॉल संयंत्रों को राहत मिल सके।
नियम में बदलाव और इसके प्रभाव
1 नवंबर 2025 से केंद्र सरकार ने नियमों में बदलाव करते हुए बिहार में इथेनॉल खरीद को 100 प्रतिशत से घटाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। इस नई नीति का असर बिहार के साथ-साथ महाराष्ट्र जैसे अन्य राज्यों में भी देखा जा रहा है, जहां पर अनाज से इथेनॉल का उत्पादन किया जाता है। पहले बिहार के संयंत्रों से शत-प्रतिशत उत्पादन की खरीद हो रही थी, लेकिन अब केवल आधे उत्पादन की ही आपूर्ति मिल रही है। इससे इन संयंत्रों का संचालन आर्थिक रूप से कठिन हो गया है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि देश में नए इथेनॉल संयंत्रों की स्थापना के कारण बिहार की खरीद कोटा में कमी की गई है, और महंगे मकई से उत्पादन करने वाले राज्यों पर जोर दिया जा रहा है। वर्तमान में बिहार में सालाना 84 करोड़ लीटर इथेनॉल का उत्पादन होता है, लेकिन अब केवल 44 करोड़ लीटर की ही खरीद का आदेश मिला है।











