बिहार विधानसभा चुनाव का पहला चरण और मुख्य फैक्टर्स
बिहार में आगामी विधानसभा चुनाव का पहला चरण महज एक महीने दूर है, जिसमें मतदान दो चरणों में होगा। इस चुनाव का परिणाम तय करने में कई महत्वपूर्ण कारक भूमिका निभाएंगे। मुख्य रूप से 19 वर्षों से अधिक समय से राज्य के मुख्यमंत्री पद संभाल रहे नीतीश कुमार और केंद्र में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थिति इस चुनाव में खास महत्व रखती है। साथ ही लालू प्रसाद यादव, उनके पुत्र तेजस्वी यादव और राहुल गांधी के मुद्दों पर जनता का समर्थन भी निर्णायक भूमिका निभाएगा।
नीतीश कुमार की सेहत और राजनीतिक प्रभाव
74 वर्षीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की स्वास्थ्य स्थिति अब पहले जैसी नहीं रही है, जो विपक्षी महागठबंधन का मुख्य हथियार बन गई है। विपक्ष का आरोप है कि अब नीतीश प्रशासन पर नियंत्रण नहीं रह गया है और राज्य का संचालन एक छोटे समूह के नेताओं और अधिकारियों के हाथ में है। तेजस्वी यादव, जो नेता प्रतिपक्ष हैं, अक्सर नीतीश कुमार के कार्यक्रमों के वीडियो साझा करते हैं ताकि यह दिखाया जा सके कि मुख्यमंत्री अब उतने सक्रिय नहीं हैं। हाल ही में पटना के एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार के बार-बार हाथ जोड़ने का वीडियो भी इसी संदर्भ में चर्चा में है।
सामाजिक और राजनीतिक प्रतिक्रिया
जेडीयू ने इन आरोपों का लगातार खंडन किया है। पार्टी के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि नीतीश कुमार ही सभी निर्णय स्वयं ले रहे हैं और उनकी सेहत विपक्ष का केवल एक मुद्दा है। वहीं, भाजपा भी बार-बार यह कह रही है कि चुनाव नीतीश के नेतृत्व में ही लड़ा जा रहा है, लेकिन वे यह स्पष्ट नहीं कर रहे हैं कि चुनाव के बाद क्या स्थिति बनेगी। बिहार में अभी भी नीतीश कुमार का सम्मान बना हुआ है, इसलिए भाजपा इस मुद्दे पर सावधानी से कदम बढ़ा रही है। यदि नीतीश की सेहत ठीक नहीं रही, तो यह स्थिति एनडीए के लिए चुनौती बन सकती है।
चुनाव से पहले सरकार की योजनाएं और जनता को लाभ
एनडीए ने विरोधी लहर को रोकने के लिए पिछले कुछ महीनों में कई जनकल्याणकारी योजनाएं शुरू की हैं। इनमें महिलाओं को आर्थिक सहायता, मुफ्त बिजली, सामाजिक सुरक्षा पेंशन में वृद्धि और बेरोजगार युवाओं के लिए भत्ता जैसी योजनाएं शामिल हैं। अब तक 1.21 करोड़ महिलाओं को 10,000 रुपये की सहायता दी गई है, और 1.89 करोड़ परिवारों को 125 यूनिट मुफ्त बिजली का लाभ मिल रहा है। साथ ही, युवाओं को दो वर्षों तक प्रति माह 1000 रुपये का भत्ता भी दिया जा रहा है। इन कदमों का मकसद मतदाताओं का समर्थन हासिल करना है।
वोट चोरी और चुनावी मुद्दे
बिहार में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची की जांच को राहुल गांधी ने मुद्दा बनाया है। उन्होंने और तेजस्वी यादव ने मिलकर यात्राएं की और वोट चोरी के मुद्दे को उठाया। हालांकि, अब यह मुद्दा कमजोर पड़ता दिख रहा है, क्योंकि महागठबंधन को लगता है कि यह मुद्दा प्रभावी नहीं रहा। परिणाम 14 नवंबर को आएंगे, और यह तय करेगा कि जनता किसके पक्ष में मतदान करती है। एनडीए ने भी इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, और दोनों पक्षों के बीच मुकाबला कड़ा है।
मुख्य राजनीतिक चेहरे और चुनावी रणनीति
एनडीए का मुख्य चेहरा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार ही हैं, लेकिन बिहार में चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद का फैसला अभी स्पष्ट नहीं है। मोदी का प्रभाव बिहार में खासा है, जबकि स्थानीय नेताओं का प्रभाव सीमित है। नीतीश कुमार की बिगड़ती सेहत के कारण मोदी की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि जेडीयू के किसी भी नेता में राज्यव्यापी अपील नहीं है। इस स्थिति में मोदी ही मुख्य नेता के रूप में उभरते हैं।
प्रशांत किशोर का प्रभाव और चुनावी रणनीति
प्रशांत किशोर, जो पहली बार चुनाव रणनीतिकार के रूप में बिहार में सक्रिय हुए हैं, ने राजनीतिक हलचल मचा दी है। उनकी पार्टी जनसुराज पार्टी (JSP) पर भाजपा को नुकसान पहुंचाने का आरोप है। किशोर ने जातिगत राजनीति से ऊबे लोगों को मुख्य मुद्दों जैसे बेरोजगारी और सुशासन पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश दिया है। कुछ का मानना है कि नीतीश कुमार ने अंतिम समय में फ्रीबी योजनाओं की घोषणा किशोर के प्रभाव में की है। यदि महागठबंधन को सीटें मिलती हैं, तो इसमें किशोर और उनकी पार्टी का भी योगदान माना जा सकता है।
भ्रष्टाचार के आरोप और राजनीतिक विवाद
प्रशांत किशोर ने हाल ही में एनडीए के नेताओं पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने दस्तावेजों के साथ दावा किया कि कई नेता करोड़ों की संपत्ति हड़प रहे हैं, जैसे उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और मंत्री अशोक चौधरी पर आरोप। किशोर ने नीतीश कुमार को ईमानदार बताया, लेकिन सरकार को सबसे भ्रष्ट भी कहा। भाजपा ने भी किशोर पर फंडिंग अनियमितताओं का आरोप लगाया है। इन आरोपों का असर चुनावी माहौल पर पड़ेगा और यह तय करेगा कि जनता किसे समर्थन देती है।
लालू यादव का जंगलराज और चुनावी नैरेटिव
एनडीए का एक पुराना नैरेटिव है कि लालू प्रसाद यादव का शासनकाल जंगलराज था। इस धारणा को फिर से मजबूत करने के लिए NDA ने 1990 से 2005 तक के लालू-राबड़ी काल को अपराध, भ्रष्टाचार और अराजकता से जोड़कर प्रचारित किया है। हाल के समय में बिहार में अपराध बढ़ने से NDA पर सवाल उठे हैं, लेकिन युवा मतदाताओं में जंगलराज का भय कम हो रहा है। बेरोजगारी और विकास के मुद्दे अब अधिक प्रभावी हो सकते हैं, जिससे जंगलराज का नैरेटिव कमजोर हो सकता है।










