बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव का प्रभाव
बिहार की राजनीतिक परिदृश्य में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव दो ऐसे दिग्गज नेता हैं जिन्होंने दशकों तक राज्य और देश की राजनीति को अपनी छवि और कार्यशैली से आकार दिया है। दोनों ही नेता लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अनुयायी रहे हैं, जिन्होंने एक साथ मिलकर एक समान विचारधारा की राजनीति शुरू की थी। आज के समय में ये दोनों नेता राजनीतिक ध्रुव बन चुके हैं।
नीतीश कुमार का विकास और विरासत
नीतीश कुमार बिहार में सुशासन का प्रतीक बन चुके हैं। उनके नेतृत्व में बिहार ने विकास के कई मील के पत्थर हासिल किए हैं। 2005 में उन्होंने बिहार को लालू-राबड़ी के जंगलराज से निकालकर सड़क, बिजली, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण जैसे क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। उनके समर्थक मानते हैं कि उन्होंने कुर्मी-कोइरी (8%) और अति पिछड़ा वर्ग (36%) का मजबूत गठबंधन बनाकर सामाजिक न्याय को नई दिशा दी।
उत्तराधिकार और आगामी चुनौतियां
हालांकि, बार-बार गठबंधन बदलने और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों ने उनकी छवि को प्रभावित किया है। उनके पुत्र निशांत कुमार को राजनीति में लाने की चर्चा भी तेज हो रही है, जो जेडीयू की राजनीतिक दिशा तय कर सकता है। 2025 के विधानसभा चुनावों में यदि जेडीयू 130 से 160 सीटें जीतती है, तो उनकी विरासत कायम रह सकती है। लेकिन यदि सीटें 40 से नीचे गिरती हैं, तो बीजेपी उनके स्थान पर आ सकती है।
लालू प्रसाद यादव की सामाजिक न्याय की विरासत
लालू प्रसाद यादव ने 1990 के दशक में मंडल आंदोलन के माध्यम से बिहार में सामाजिक न्याय की नींव रखी। उनके नेतृत्व में पिछड़ों, दलितों और मुस्लिमों को सशक्त बनाने का प्रयास किया गया। उनका मुस्लिम-यादव (MY, 31%) गठबंधन आरजेडी का आधार है। उन्होंने पंचायतों में ओबीसी आरक्षण और सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा दिया, लेकिन चारा घोटाला और जंगलराज जैसी घटनाओं ने उनकी छवि को नुकसान पहुंचाया।
तेजस्वी यादव का उत्तराधिकारी के रूप में उदय
लालू यादव की विरासत का मुख्य उत्तराधिकारी तेजस्वी यादव (35 वर्ष) हैं। जनवरी 2025 में राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने उन्हें लालू के समान शक्तियां दीं। उन्होंने यादव, मुस्लिम और गैर-यादव ओबीसी-दलित समुदायों को जोड़कर अपनी पकड़ मजबूत की है। उनके वादे जैसे 10 लाख नौकरियों का लक्ष्य और युवा वोटरों को आकर्षित करने की रणनीति ने 2020 में आरजेडी को सबसे बड़ी पार्टी बनाने में मदद की।
आगे की राह और चुनौतियां
हालांकि, जंगलराज की छवि, परिवारिक कलह और गठबंधन में वामपंथी दलों के साथ तालमेल जैसी चुनौतियों का सामना उन्हें करना पड़ रहा है। यदि तेजस्वी इस बार मुख्यमंत्री पद नहीं जीत पाते हैं, तो उनकी विरासत पर सवाल खड़े हो सकते हैं। उनके पास अभी भी लंबा राजनीतिक करियर है, लेकिन बिहार की राजनीति दिन-ब-दिन कठिन होती जा रही है।











