बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की ऐतिहासिक जीत और वोट शेयर में बढ़ोतरी
बिहार के चुनावी मैदान में इस बार राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। यह जीत केवल सीटों की संख्या तक सीमित नहीं रही, बल्कि वोट प्रतिशत में भी स्पष्ट बढ़त देखने को मिली है। भाजपा (BJP) और जनता दल यूनाइटेड (JDU) ने लगभग 101-101 सीटों पर अपनी दावेदारी जताई थी, जिससे मुकाबला काफी रोमांचक रहा।
बिहार चुनाव में भाजपा और जेडीयू की शानदार वापसी
भाजपा ने इस बार अपने प्रदर्शन को बेहतर बनाते हुए 89 सीटें जीत लीं, जो पिछली बार की तुलना में 15 सीटें अधिक हैं। इस जीत के साथ ही भाजपा राज्य की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। वहीं, जेडीयू ने भी जोरदार वापसी की और 85 सीटें जीतकर 42 सीटों का लाभ हासिल किया। बिहार विधानसभा चुनाव की विस्तृत रिपोर्ट के लिए यहां क्लिक करें और हर सीट का विश्लेषण पढ़ें।
नई पार्टियों का प्रदर्शन और वोट शेयर में बदलाव
इस बार पहली बार एनडीए का हिस्सा बनी लोजपा (RV) ने 19 सीटें जीतकर अपनी ताकत दिखाई। वहीं, जीतनराम मांझी की HAM ने 5 और उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएम ने 4 सीटें हासिल कीं। इन दलों का यह प्रदर्शन गठबंधन को निर्णायक बहुमत दिलाने में अहम रहा।
वहीं, महागठबंधन को इस चुनाव में बड़ा झटका लगा। गठबंधन कुल मिलाकर केवल 35 सीटें ही जीत पाया, जो पिछली बार की तुलना में 79 सीटें कम हैं। उनका वोट शेयर 39 प्रतिशत रहा, लेकिन सीटों पर इसका कोई खास प्रभाव नहीं दिखा। आरजेडी ने मात्र 25 सीटें जीतीं, जो पिछली बार से 50 कम हैं। कांग्रेस का प्रदर्शन भी कमजोर रहा और वह महज 6 सीटों पर सिमट गई। वाम दलों और अन्य छोटे दलों ने कुल मिलाकर चार सीटें हासिल की हैं।
महागठबंधन में डिप्टी सीएम पद का दावेदार माने जाने वाले मुकेश सहनी को भी हार का सामना करना पड़ा। उन्होंने 60 सीटों पर अपनी दावेदारी रखी थी, लेकिन अंत में केवल 15 सीटों पर चुनाव लड़े और उनका खाता भी नहीं खुल सका। चुनाव प्रचार के दौरान वह तेजस्वी यादव के साथ नजर आए, जिससे सवाल उठने लगे हैं कि क्या सहनी महागठबंधन के लिए कमजोर कड़ी साबित हुए।
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने इस बार उल्लेखनीय प्रदर्शन किया है। उसने 29 में से 24 सीटें मुस्लिम-बहुल सीमांचल क्षेत्र में जीत हासिल की। पार्टी ने कुल 243 सीटों में से 5 पर जीत दर्ज की, जिनमें से अधिकांश क्षेत्र मुस्लिम बहुल हैं। वहीं, बसपा ने भी एक सीट पर जीत हासिल की है।
प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा। बेरोजगारी और पलायन जैसे मुद्दों के बावजूद पार्टी कोई खास प्रभाव नहीं डाल सकी और उसका खाता भी नहीं खुल पाया।
वोट शेयर में बढ़ोतरी और सीटों का वितरण
बिहार में एनडीए की इस ऐतिहासिक जीत का एक बड़ा कारण वोट शेयर में भी बढ़ोतरी है। भाजपा का वोट शेयर 20.07 प्रतिशत तक पहुंच गया, जो 2020 में 19.46 प्रतिशत था। भाजपा ने इस बार 101 सीटों पर चुनाव लड़ा, जबकि पिछली बार 110 सीटों पर थी।
जेडीयू ने भी इस चुनाव में अपनी स्थिति मजबूत की। उसका वोट शेयर 15.39 प्रतिशत से बढ़कर 19.26 प्रतिशत हो गया। जेडीयू ने पिछली बार के मुकाबले कम यानी 101 सीटों पर चुनाव लड़ा।
वहीं, सबसे बड़ी पार्टी आरजेडी (RJD) ने 141 सीटों पर चुनाव लड़ा और 23 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया, जो 2020 के 23.11 प्रतिशत से थोड़ा कम है। वोट शेयर स्थिर रहने के बावजूद, सीटों में भारी गिरावट यह दर्शाती है कि इस बार वोट का भूगोल बदल गया है। कांग्रेस का वोट शेयर भी घटकर 8.72 प्रतिशत रह गया है, जबकि उसने पिछली बार 70 सीटें लड़ी थीं। इस बार वह 61 सीटों पर ही चुनाव लड़ सकी। वाम दलों में सीपीआई(एमएल) लिबरेशन का वोट शेयर 3.16 प्रतिशत से घटकर 2.84 प्रतिशत हो गया है।
असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने अकेले चुनाव लड़ा और लगभग 2 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया, जो 2020 के 1.24 प्रतिशत से बढ़ोतरी है। इससे पता चलता है कि कुछ इलाकों में पार्टी का राजनीतिक प्रभाव बढ़ रहा है।









