बिहार में महागठबंधन की सीट बंटवारे में खींचतान
बिहार के राजनीतिक गलियारों में महागठबंधन की स्थिरता पर सवाल उठने लगे हैं। पहले चरण के नामांकन के बाद भी कम से कम पांच सीटों पर सहमति नहीं बन पाई है। कांग्रेस और आरजेडी दोनों ही अपने-अपने दावों में कह रहे हैं कि सब कुछ ठीक चल रहा है, लेकिन हकीकत इससे अलग ही नजर आ रही है।
उदाहरण के तौर पर, लालगंज सीट पर कांग्रेस ने आदित्य कुमार राजा को टिकट दिया, जबकि आरजेडी ने उसी सीट से शिवानी शुक्ला को प्रत्याशी घोषित कर दिया। इसी तरह, कहलगांव सीट पर कांग्रेस ने प्रवीण सिंह कुशवाहा को उम्मीदवार बनाया, वहीं आरजेडी ने भी अपने प्रत्याशी को उतार दिया। इससे स्पष्ट है कि महागठबंधन के भीतर ही सीटों को लेकर मतभेद उभर कर सामने आ रहे हैं।
सीट बंटवारे में बढ़ते विवाद और राजनीतिक तनाव
कहलगांव, सिकंदरा और बचवाड़ा जैसी सीटों पर दोनों दलों ने अपने-अपने उम्मीदवार उतार दिए हैं, जिससे महागठबंधन में ही एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने की स्थिति बन गई है। यह स्थिति राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चिंता का विषय बन गई है।
कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि यह टकराव पहले से ही तय था। करीब आठ महीने पहले बिहार कांग्रेस को नया प्रदेश अध्यक्ष और प्रभारी मिला था। प्रभारी कृष्ण अल्लावरू, जो राहुल गांधी के करीबी माने जाते हैं, ने शुरुआत से ही आरजेडी के प्रति सख्त रवैया अपनाया। उन्होंने कई वरिष्ठ नेताओं को किनारे कर दिया, जिससे सीट बंटवारे में जटिलताएं बढ़ गईं।
सूत्रों के अनुसार, नए प्रदेश अध्यक्ष राजेश राम, सीएलपी नेता शकील अहमद खान और कृष्ण अल्लावरू ने दिल्ली नेतृत्व को यह समझाने की कोशिश की कि कांग्रेस अब केवल “भरने वाली पार्टी” नहीं रह सकती। उनका तर्क था कि यह कांग्रेस के लिए अपने पुराने प्रभाव वाले क्षेत्रों को फिर से हासिल करने का अवसर है।
छोटे दलों की बढ़ती मांगें और विवाद
महागठबंधन में मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (VIP) की भागीदारी ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। सहनी ने बार-बार कहा कि उनकी पार्टी 60 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और उन्हें उपमुख्यमंत्री पद का वादा भी किया गया है।
कांग्रेस का तर्क है कि जब वीआईपी के पास न तो सांसद हैं और न ही विधायक, तो इतनी सीटों की मांग कैसे की जा सकती है। वहीं, सीपीआई(एमएल) ने भी तेजस्वी यादव के 19 सीटों के प्रस्ताव को खारिज कर दिया। उनका कहना है कि 2020 में उन्होंने 19 सीटों पर चुनाव लड़ा और 12 जीते, इसलिए उनका प्रदर्शन अच्छा रहा। अब वे 30 से अधिक सीटों की मांग कर रहे हैं।
इसी तरह, इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी, पशुपति पारस गुट और झारखंड मुक्ति मोर्चा जैसी छोटी पार्टियों की स्थिति भी अभी स्पष्ट नहीं है। कुल मिलाकर, महागठबंधन के नेताओं ने सीट बंटवारे के पहले ही सही “होमवर्क” नहीं किया, जिससे विवाद और बढ़ गया है।
आरजेडी का रवैया और गठबंधन की चुनौतियां
महागठबंधन के एक वरिष्ठ नेता का मानना है कि इस स्थिति के लिए आरजेडी (RJD) भी जिम्मेदार है। 2020 के विधानसभा चुनाव में आरजेडी ने 144 सीटों पर चुनाव लड़ा था और इस बार भी वह 130-135 सीटों पर दावा कर रही है।
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब उन्होंने अपनी सीटें 70 से घटाकर लगभग 60 कर दीं, तो आरजेडी, जिसने पिछली बार उनसे दोगुनी सीटें लड़ी थीं, केवल 10-12 सीटें ही घटा रही है। यह व्यवहार दिखाता है कि आरजेडी गठबंधन में “बड़े भाई” की भूमिका निभाने के बजाय “बॉस” की तरह व्यवहार कर रही है। इस रवैये ने सीट बंटवारे के समझौते को और भी जटिल बना दिया है।











