बिहार में कांग्रेस की नई संगठनात्मक रणनीति और चुनावी तैयारी
बिहार विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद कांग्रेस अब अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत करने के लिए नई योजनाओं पर काम कर रही है। पार्टी ने अपने संगठन को पुनः सशक्त बनाने के उद्देश्य से महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की मंजूरी के बाद, राज्य में संगठनात्मक जिलों के पुनर्गठन का प्रस्ताव स्वीकृत किया गया है। इसके परिणामस्वरूप, सोमवार को बिहार के 53 जिलों के नए अध्यक्षों की नियुक्ति की घोषणा कर दी गई है।
बिहार में कांग्रेस ने नए जिलाध्यक्षों के साथ अपनी रणनीति को दी नई दिशा
कांग्रेस ने लंबे इंतजार के बाद आखिरकार बिहार के सभी 53 संगठनात्मक जिलों में नए अध्यक्ष नियुक्त किए हैं। इन नियुक्तियों में 43 नए चेहरों को मौका दिया गया है, जबकि 10 पुराने जिलाध्यक्षों को फिर से जिम्मेदारी सौंपी गई है। पिछले साल नवंबर में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन निराशाजनक रहा था, जिसमें पार्टी को केवल छह सीटों पर जीत मिली थी। इसके बाद पार्टी के अंदरूनी मतभेद भी उभर कर सामने आए थे, जिसमें बिहार के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू और प्रदेश अध्यक्ष राजेश रंजन पर गंभीर आरोप लगे थे। अब चार महीने बाद, कांग्रेस ने संगठन को फिर से खड़ा करने के लिए नई रणनीति अपनाई है, जिसमें सामाजिक समीकरणों का ध्यान रखा गया है।
सामाजिक समीकरण और चुनावी रणनीति में बदलाव की दिशा में कदम
बिहार में कांग्रेस ने अपने संगठनात्मक ढांचे को फिर से मजबूत करने के लिए जिलाध्यक्षों की नई सूची जारी की है। इस सूची में दलित, सवर्ण, यादव, मुस्लिम और अन्य पिछड़ी जातियों के नेताओं को उचित स्थान दिया गया है। खास बात यह है कि पार्टी ने अपने पुराने दलित कार्ड से पीछे हटते हुए, अब सवर्ण और यादव वर्ग को भी प्रतिनिधित्व दिया है। इससे संकेत मिलता है कि कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को फिर से हासिल करने का प्रयास कर रही है।
बिहार के 53 जिलों में से 38 जिलों की जिम्मेदारी सवर्ण, दलित और मुस्लिम नेताओं को दी गई है। पटना जिले में भी दो सवर्ण नेताओं को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिनमें भूमिहार और सिख समुदाय से आने वाले नेता शामिल हैं। इस नई नियुक्ति से स्पष्ट है कि कांग्रेस अब ब्राह्मण और यादव वोट बैंक पर विशेष ध्यान दे रही है। खासतौर पर ब्राह्मण और अगड़ी जातियों के बीच नाराजगी को भुनाने के लिए पार्टी ने इन वर्गों से 10-10 जिलाध्यक्ष बनाए हैं।
यह रणनीति इस बात का संकेत भी है कि कांग्रेस अपने पुराने वोट बैंक को फिर से मजबूत करने के साथ ही, राष्ट्रीय जनता दल (RJD) से दूरी बनाकर अकेले बिहार में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रही है। पार्टी ने संगठन सृजन अभियान चलाकर सभी जिलों में पर्यवेक्षक तैनात किए थे और पद के दावेदारों का इंटरव्यू भी लिया गया था। इन सभी प्रयासों के आधार पर ही पार्टी ने अपने नए जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की है।









