बिहार की राजनीति में नई हलचल और संभावित क्रॉसओवर
बिहार की राजनीतिक स्थिति एक बार फिर से अस्थिरता की ओर बढ़ रही है, जहां हाल ही में संपन्न 2025 विधानसभा चुनावों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) ने भारी बहुमत हासिल किया है। इस जीत के बाद, खबरें हैं कि कांग्रेस के छह विधायकों के जनता दल (यूनाइटेड) (जेडीयू) में शामिल होने की चर्चा तेज हो गई है। सूत्रों के अनुसार, ये विधायक मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (Nitish Kumar) के संपर्क में हैं, और मकर संक्रांति के बाद संभवतः यह राजनीतिक बदलाव हो सकता है। इसके साथ ही उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) की पार्टी आरएलएम (Rashtriya Lok Manch) के तीन विधायकों के बीजेपी (BJP) में जाने की भी चर्चा जोर पकड़ रही है। सवाल उठता है कि जब एनडीए को बहुमत से अधिक समर्थन प्राप्त है, तो बीजेपी और जेडीयू में विधायकों की संख्या बढ़ाने की होड़ क्यों मची है? आखिर एनडीए में क्या चल रहा है?
2025 बिहार विधानसभा चुनाव का परिणाम और एनडीए की मजबूत स्थिति
2025 के बिहार विधानसभा चुनाव ने राज्य की राजनीति में एक नया अध्याय लिखा है। नवंबर 2025 में हुए इस चुनाव में एनडीए ने कुल 243 सीटों में से 202 पर जीत हासिल की, जो स्पष्ट बहुमत का संकेत है। इस गठबंधन में जेडीयू, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी), लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी रामविलास) और अन्य छोटे दल शामिल हैं। नीतीश कुमार की जेडीयू ने 101 सीटों पर चुनाव लड़ा और 80 सीटें जीत लीं, जबकि बीजेपी ने भी 101 सीटों पर चुनाव लड़ा और 90 सीटें हासिल कीं।
एलजेपी (आरवी) को 29 सीटें मिलीं, और बाकी सीटें अन्य सहयोगियों ने बांटी हैं। इस जीत का मुख्य कारण नीतीश कुमार की छवि एक विकास पुरुष के रूप में मजबूत होना माना गया, जिसमें महिलाओं के लिए नकद हस्तांतरण योजनाएं और चुनाव के दौरान किए गए फंड ट्रांसफर जैसे कदम शामिल हैं। साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Narendra Modi) की चुनावी रैलियों और बीजेपी की चुनावी मशीनरी ने भी इस गठबंधन को मजबूती दी। विपक्षी महागठबंधन, जिसमें आरजेडी (RJD), कांग्रेस और अन्य दल शामिल थे, केवल 41 सीटों पर सिमट कर रह गया। आरजेडी सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी बनी, लेकिन सरकार बनाने से दूर रह गई। कांग्रेस ने महज छह सीटें जीतीं, जो उसके लिए बड़ा झटका था।
कांग्रेस विधायकों के जेडीयू में शामिल होने की अफवाहें और राजनीतिक हलचल
चुनाव के महज दो महीने बाद ही बिहार में राजनीतिक गतिविधियों ने तेज़ी पकड़ ली है। खबरें हैं कि कांग्रेस के सभी छह विधायक-सुरेंद्र प्रसाद, अभिषेक रंजन, मनोज विश्वास, अबिदुर रहमान, कमरुल होदा और मनोहर प्रसाद-जेडीयू के संपर्क में हैं। इनमें से दो विधायक, सुरेंद्र प्रसाद और अभिषेक रंजन, हाल ही में कांग्रेस की ‘मनरेगा बचाओ संग्राम’ बैठक में अनुपस्थित रहे, जो असंतोष का संकेत माना जा रहा है। इसके बाद इन विधायकों ने पार्टी के अन्य कार्यक्रमों में भाग नहीं लिया। हालांकि कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने इन अफ़वाहों को खारिज किया है और कहा है कि उनके विधायक कहीं नहीं जा रहे हैं।
वहीं, एनडीए के नेता जैसे एलजेपी (आरवी) के मंत्री संजय सिंह और बीजेपी के मंत्री लाखेंद्र पासवान का दावा है कि ये विधायक मकर संक्रांति के बाद एनडीए में शामिल हो सकते हैं। उनका तर्क है कि खरमास (जो अशुभ माना जाता है) समाप्त होने के बाद यह कदम उठाया जा सकता है। विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस में नेतृत्व के खिलाफ असंतोष है, जैसा कि मधुबनी में पार्टी की आंतरिक लड़ाई से स्पष्ट होता है। यदि ये छह विधायक जेडीयू में शामिल हो जाते हैं, तो कांग्रेस की संख्या विधानसभा में शून्य हो जाएगी, जिससे महागठबंधन और कमजोर हो जाएगा। कांग्रेस ने इन दावों को खारिज किया है, लेकिन पार्टी ने चुनाव के दौरान 43 नेताओं को शो-कॉज नोटिस भी जारी किया है। बिहार की राजनीति में यह डिफेक्शन की सामान्य प्रक्रिया है।
एनडीए में विधायकों की संख्या बढ़ाने की होड़ क्यों?
जहां कांग्रेस अपने विधायकों को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं एनडीए के भीतर भी विधायकों की संख्या बढ़ाने की होड़ मची हुई है। जेडीयू पर विपक्ष की पार्टी कांग्रेस से छह विधायकों को तोड़ने का आरोप है, तो वहीं बीजेपी पर भी आरएलएम (राष्ट्रीय लोक मोर्चा) के विधायकों को तोड़ने का आरोप लग रहा है। कहा जा रहा है कि आरएलएम के चार में से तीन विधायक बीजेपी के संपर्क में हैं, जबकि चौथी विधायक पार्टी के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा (Upendra Kushwaha) की पत्नी हैं। पार्टी में असंतोष का कारण कुशवाहा का अपने बेटे दीपक प्रकाश को मंत्री बनवाने का प्रयास है, जो अभी राजनीति में नए हैं और किसी सदन के सदस्य भी नहीं हैं।
बिहार विधानसभा में एनडीए के 202 विधायकों में बीजेपी के पास 89 और जेडीयू के पास 85 विधायक हैं। यदि कांग्रेस के छह विधायक जेडीयू में शामिल हो जाते हैं, तो जेडीयू की संख्या 91 हो जाएगी, और वह सबसे बड़ी पार्टी बन जाएगी। वहीं, यदि आरएलएम के तीन विधायक बीजेपी में चले जाते हैं, तो बीजेपी के पास 92 विधायक हो जाएंगे, जिससे वह फिर से बिहार विधानसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में अपनी स्थिति मजबूत कर लेगी।
आरएलएम के भीतर भी असंतोष की खबरें हैं। 20 नवंबर को नीतीश मंत्रिमंडल के गठन के तुरंत बाद से ही कुशवाहा के समर्थक नेताओं ने नाराजगी जाहिर की है। हाल ही में, कुशवाहा ने अपने समर्थकों को मनाने के लिए ‘लिट्टी भोज’ का आयोजन किया, जिसमें तीनों विधायक शामिल नहीं हुए। इसके बजाय, वे भाजपा के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मिलने चले गए। सूत्रों का कहना है कि आरएलएम में जल्द ही विभाजन हो सकता है, जिससे कुशवाहा के संभावित राज्यसभा पुनर्निर्वाचन पर संकट आ सकता है।
क्या यह क्रॉसओवर नीतीश की रणनीति का हिस्सा है?
सवाल उठता है कि क्या नीतीश कुमार (Nitish Kumar) अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए इन विधायकों को अपने साथ जोड़ रहे हैं। नीतीश, जो एनडीए के प्रमुख चेहरे हैं, पहले भी अपनी राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए जाने जाते हैं। 2019 के विधानसभा चुनाव में जेडीयू बीजेपी से पीछे रह गई थी, लेकिन 2025 के चुनाव में दोनों के बीच का अंतर बहुत कम रह गया है।
कांग्रेस के विधायकों को जेडीयू में शामिल कराकर नीतीश कुमार अपनी विधानसभा संख्या बढ़ा सकते हैं, जो वर्तमान में 85 है। इससे एनडीए में जेडीयू का वज़न बढ़ेगा और बीजेपी पर निर्भरता कम होगी। साथ ही, यह कदम आरजेडी (RJD) और कांग्रेस के गठबंधन को तोड़ने की रणनीति भी हो सकती है, जो 2025 में असफल रहा। कांग्रेस का कमजोर होना महागठबंधन के आधार को हिला सकता है।
लेकिन सवाल यह है कि नीतीश कुमार अभी भी एनडीए में रहकर अपना प्रभाव क्यों बढ़ाना चाहते हैं? क्या यह उनकी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है, या फिर वह बिहार में अपनी स्थिति और अधिक मजबूत करना चाहते हैं?









