बिहार में विकास योजनाओं की हकीकत सामने आई
बिहार में विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच जमीन पर दिखाई दे रही तस्वीर कुछ और ही है। कई जगह पुल का निर्माण तो हो चुका है, लेकिन उस तक पहुंचने के लिए सड़क का अभाव है। वहीं, कुछ स्थानों पर सड़कें तो बन गई हैं, लेकिन मुख्य पुल का निर्माण अभी भी लंबित है। अररिया और किशनगंज जिलों से प्राप्त रिपोर्टें इस बात का स्पष्ट संकेत देती हैं कि राज्य में बुनियादी ढांचे की योजनाएं कितनी अधूरी हैं।
अररिया में अधूरे पुल और सड़कें
अररिया जिले के कोचगामा गांव का मामला इस बात का उदाहरण है। यह गांव अररिया-पूर्णिया फोरलेन (NH-57) से महज 500 मीटर दूर है। यहां 2016 में बेलवा नदी पर एक पुल का निर्माण किया गया, लेकिन आश्चर्य की बात यह है कि उस पुल तक पहुंचने के लिए अभी तक कोई एप्रोच रोड नहीं बनाई गई है। नतीजा यह है कि करीब दस साल बीत जाने के बाद भी यह पुल स्थानीय लोगों के काम नहीं आ रहा है। ग्रामीणों को राष्ट्रीय राजमार्ग तक पहुंचने के लिए 10 से 15 किलोमीटर का अतिरिक्त रास्ता तय करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल बन जाने के बाद ठेकेदार ने बिना एप्रोच रोड बनाए ही काम छोड़ दिया। इसके बाद न तो प्रशासन ने कोई ध्यान दिया और न ही जनप्रतिनिधियों ने इस दिशा में कोई ठोस कदम उठाए। वर्तमान में ग्रामीण नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेने को मजबूर हैं। बरसात के मौसम में स्थिति और भी खराब हो जाती है, जब स्कूली बच्चे, मरीज, महिलाएं और बुजुर्ग नदी पार करने के लिए जोखिम भरे रास्ते का सहारा लेते हैं।
किशनगंज में अधूरे पुल का मामला
किशनगंज जिले के धूम गांव से भी ऐसी ही तस्वीर सामने आई है। यहां खेतों के बीच एक छोटी पुलिया बनी हुई है, लेकिन उसके आगे कोई सड़क नहीं है और न ही नदी पर मुख्य पुल का निर्माण हुआ है। यह पुलिया लगभग छह साल पहले बनाई गई थी। किसानों का कहना है कि उन्हें बताया गया था कि रमजान नदी पर बड़ा पुल बनेगा, लेकिन आज तक वह योजना कागजों में ही सीमित रह गई है।
जब इस मामले का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, तो प्रशासन ने तुरंत कार्रवाई की। किशनगंज के जिलाधिकारी ने जांच के आदेश दिए और बताया कि मुख्य पुल का प्रस्ताव अभी भी सरकार के पास लंबित है। यानी, पहले एप्रोच रोड और पुलिया का निर्माण कर दिया गया, लेकिन मुख्य पुल का स्वीकृति पत्र अभी तक नहीं मिला है।
यह दोनों उदाहरण इस बात को स्पष्ट करते हैं कि योजनाओं की प्राथमिकता तय करने में कितनी खामियां हैं। जब पुल बनाना था, तो सड़क क्यों नहीं बनाई गई? और यदि पुल की मंजूरी नहीं थी, तो फिर एप्रोच रोड क्यों बना दी गई? इन अधूरे विकास कार्यों का खामियाजा स्थानीय जनता भुगत रही है, जो आज भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है।









