भारतीय सेना का राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में महत्व
भारतीय सेना सदैव देश की एकता और अखंडता का प्रतीक रही है। देश की राजनीति में चाहे कितनी भी मतभिन्नताएँ क्यों न हों, सेना को कभी भी राजनीतिक विवादों में नहीं घसीटा गया। यह संस्था देशभक्ति और समर्पण का प्रतीक है, जो हर परिस्थिति में राष्ट्र की रक्षा के लिए तत्पर रहती है।
सेना का सामाजिक और जातीय प्रतिनिधित्व
हालांकि, हाल के वर्षों में कुछ नेताओं ने सेना में जातीय और सामाजिक भागीदारी को लेकर नए विवाद खड़े किए हैं। खासकर राहुल गांधी ने सेना में 10 प्रतिशत ऊंची जातियों का नियंत्रण होने का दावा कर यह सवाल उठाए हैं कि क्या देश की 90 प्रतिशत आबादी का इसमें कोई प्रतिनिधित्व है। यह बयान राष्ट्रीय सुरक्षा और सामाजिक समरसता के लिहाज से गंभीर चर्चा का विषय बन गया है।
सामाजिक न्याय और सेना में भागीदारी का सच
भारतीय सेना में जाति आधारित आंकड़ों का कोई आधिकारिक सर्वे नहीं है, लेकिन विभिन्न स्रोतों से ज्ञात होता है कि सेना का लगभग 60 प्रतिशत हिस्सा देश की मुख्य आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। सिख समुदाय का लगभग 8 प्रतिशत हिस्सा सेना में है, जबकि मुसलमानों का हिस्सा करीब 2 प्रतिशत है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि सेना में भर्ती मेरिट और योग्यता के आधार पर होती है, न कि केवल जाति या क्षेत्रीय आधार पर।
राजनीतिक बयानबाजी और चुनावी रणनीति
राहुल गांधी का यह बयान खासतौर पर बिहार विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखकर दिया गया प्रतीत होता है। यह बयान जाति आधारित वोट बैंक को मजबूत करने का प्रयास है, जिसमें उन्होंने दावा किया कि देश की 10 प्रतिशत ऊंची जातियों का नियंत्रण सेना, न्यायपालिका और मीडिया पर है। इस तरह की बातें चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकती हैं, लेकिन इन पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक है।
गुजरात, तमिलनाडु और बंगाल में जातीय प्रतिनिधित्व का सच
राहुल गांधी का यह तर्क कि सेना में कम प्रतिनिधित्व पाने वाले वर्गों पर अत्याचार हो रहा है, पूरे देश के विभिन्न राज्यों में भर्ती के आंकड़ों से मेल नहीं खाता। उदाहरण के तौर पर गुजरात और बंगाल जैसे राज्यों में सेना में भर्ती की संख्या अपेक्षाकृत कम है, जबकि इन राज्यों की आबादी अधिक है। यह दर्शाता है कि भर्ती प्रक्रिया मेरिट और क्षेत्रीय परंपराओं पर आधारित है, न कि केवल जाति या क्षेत्रीय भेदभाव पर।
क्षेत्रीय और जातीय आधार पर सेना भर्ती का वास्तविक चित्र
सेना में भर्ती का आधार मेरिट और योग्यता है, लेकिन क्षेत्रीय और जातीय कोटा भी इसमें भूमिका निभाते हैं। उत्तर भारत जैसे पंजाब, हरियाणा और उत्तराखंड से अधिक संख्या में भर्ती होती है, क्योंकि इन क्षेत्रों में सैन्य परंपरा मजबूत है। वहीं, दक्षिण और पूर्वी राज्यों से भर्ती कम होती है। यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि सेना में भागीदारी का पैटर्न विविधताओं और योग्यता के आधार पर तय होता है।
आत्ममूल्यांकन और पार्टी में सुधार की आवश्यकता
राहुल गांधी को अपने राजनीतिक दल और सरकार में भी जातीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व को सुधारने की दिशा में कदम उठाने चाहिए। पार्टी में टिकट वितरण के समय जाति और सामाजिक पृष्ठभूमि का ध्यान रखना जरूरी है, ताकि जनता का विश्वास कायम रहे। यदि कांग्रेस अपने ही घर से शुरुआत नहीं करेगी, तो उसकी विश्वसनीयता पर सवाल उठेंगे।
सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता
यदि राहुल गांधी वास्तव में समाज के कमजोर वर्गों के हित में कार्य करना चाहते हैं, तो उन्हें अपने पार्टी के अंदर भी समानता और न्याय को प्राथमिकता देनी चाहिए। इससे न केवल पार्टी की छवि मजबूत होगी, बल्कि देश में सामाजिक समरसता भी बढ़ेगी। तभी जनता उनके प्रयासों को स्वीकार करेगी और उनका समर्थन मिलेगा।










