बिहार चुनाव में भूमिहार समुदाय का राजनीतिक महत्व
बिहार में चुनावी माहौल तेज़ी से गर्म हो रहा है, और राजनीतिक दलों के बीच कड़ी प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही है। इस बार खास बात यह है कि भूमिहार समुदाय का राजनीतिक प्रभाव चुनावी मैदान में निर्णायक भूमिका निभा रहा है। पारंपरिक रूप से बीजेपी (BJP) को समर्थन देने वाले इस समुदाय में अब कई सीटों पर भूमिहार बनाम भूमिहार की टक्कर देखने को मिल रही है, जिससे हर पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने में लगी है।
भूमिहार समुदाय का राजनीतिक इतिहास और वर्तमान स्थिति
बिहार में भूमिहार जाति का ऐतिहासिक रूप से राजनीतिक वर्चस्व रहा है। पहले मुख्यमंत्री श्रीकृष्ण सिन्हा जैसे नेता इसी समुदाय से थे। जातिगत सर्वेक्षण के अनुसार, बिहार में भूमिहार की आबादी लगभग 2.9 प्रतिशत है, लेकिन उनकी राजनीतिक भागीदारी और प्रभाव काफी अधिक है। 2020 के विधानसभा चुनाव में लगभग आधे भूमिहार मतदाताओं ने एनडीए (NDA) को समर्थन दिया था, जबकि महागठबंधन को केवल 19 प्रतिशत वोट मिले थे।
इस बार भी, बिहार के कई जिलों जैसे बिक्रम, पाली, जहानाबाद, मोकामा, मुंगेर, बेगूसराय और नवादा में भूमिहार वोटरों का प्रभाव निर्णायक माना जा रहा है। इन इलाक़ों में उनके झुकाव का रुख किस ओर रहेगा, यह चुनाव परिणाम को प्रभावित कर सकता है।
मुख्य सीटों पर भूमिहार बनाम भूमिहार मुकाबला
बिहार के कई महत्वपूर्ण विधानसभा क्षेत्रों में इस बार भूमिहार प्रत्याशियों के बीच सीधी टक्कर देखने को मिल रही है। मोकामा, केसुआ, बरबीघा, बेगूसराय, मटिहानी, बिक्रम और लखीसराय जैसी सीटें इस बार खास चर्चा में हैं। इनमें से कई सीटों पर दोनों पक्षों ने अपने-अपने भूमिहार उम्मीदवार उतारे हैं, जिससे मुकाबला दिलचस्प हो गया है।
उप-मुख्यमंत्री विजय सिन्हा के खिलाफ कांग्रेस ने भूमिहार प्रत्याशी अमरेश अनीश को मैदान में उतारा है। ऐसे में इन सीटों पर मुकाबला कड़ा हो गया है, और परिणाम का असर पूरे बिहार की राजनीति पर पड़ेगा।
राजनीतिक दलों की रणनीति और भविष्य की दिशा
बिहार में चुनावी रणनीति में भूमिहार समुदाय का महत्व स्पष्ट रूप से दिख रहा है। बीजेपी (BJP) ने लगभग 32 भूमिहार उम्मीदवारों को टिकट दिया है, जबकि महागठबंधन ने भी करीब 15 भूमिहार प्रत्याशियों को मौका दिया है। दोनों पक्षों की कोशिश है कि इस समुदाय का समर्थन हासिल किया जाए।
बिहार के बिक्रम, पटना और अन्य इलाक़ों में भी भूमिहार वोटरों का प्रभाव बड़ा माना जा रहा है। बीजेपी का दावा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में विकास कार्यों का लाभ इस समुदाय को भी मिला है। वहीं, महागठबंधन में तेजस्वी यादव ने भी इस समुदाय को प्राथमिकता दी है, जिससे उनके वर्चस्व को चुनौती मिल सकती है।
अंततः, बिहार में भूमिहार समुदाय का राजनीतिक वर्चस्व अभी भी मजबूत है, लेकिन बदलते समीकरणों के साथ उनकी भूमिका में भी बदलाव आ रहा है। आने वाले चुनावों में यह समुदाय किस ओर झुकेगा, यह बिहार की सरकार बनाने की प्रक्रिया को तय करेगा।











