बिहार का स्वतंत्रता संग्राम और चुनाव प्रक्रिया का इतिहास
बिहार के स्वतंत्रता संग्राम के बाद देश में लोकतंत्र की स्थापना का सपना जागरूक जनता और नेताओं के बीच तेजी से पनपा। उस समय देश में चुनाव प्रणाली को मजबूत बनाने के लिए मतदाता सूची का निर्माण आवश्यक था, लेकिन स्वतंत्रता से पहले मतदाता पहचान पत्र और वोटर रिकॉर्ड जैसी कोई व्यवस्था नहीं थी। आजादी के साथ ही देश का विभाजन भी हुआ, जिससे लाखों लोग विस्थापित हो गए। इन विस्थापितों के पास न तो पहचान पत्र थे और न ही कोई दस्तावेज। सबसे बड़ा सवाल था कि आखिर चुनाव में वोट किसके द्वारा डाले जाएंगे, जब अंग्रेजों ने भारत में वोट का अधिकार सभी को नहीं दिया था।
पहले चुनाव की चुनौतियां और नई शुरुआत
विभाजन के बाद पहली बार स्वतंत्र भारत में चुनाव आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना। इस जिम्मेदारी को संभालने वाले पहले चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन थे। चुनाव आयोग को शुरुआत से ही शून्य से शुरुआत करनी पड़ी। समय लगा, लेकिन तैयारी जारी रही। तय हुआ कि अब हर वयस्क नागरिक को वोट का अधिकार मिलेगा, और महिलाएं अपने नाम से वोट डालेंगी। स्वतंत्रता के चार साल बाद देश का पहला आम चुनाव हुआ, जिसमें लाखों विस्थापित और बेखबर लोग भी शामिल हुए।
प्रथम चुनाव का ऐतिहासिक महत्व
25 अक्टूबर 1951 को भारत के करीब एक अरब नागरिकों ने पहली बार अपने मताधिकार का प्रयोग किया। उस समय वोटिंग के साथ-साथ देश की बेबसी और पहचान की बेड़ियों को तोड़ा गया। महिलाएं भी अपने नाम से वोट डालने लगीं, जो पहले केवल पति या पिता के नाम पर ही दर्ज थीं। उस समय चुनाव का माहौल बहुत ही सरल और सादा था, नेता बैलगाड़ी और साइकिल पर प्रचार करते थे। 24 फरवरी 1952 को लोकसभा के पहले चुनाव का आयोजन हुआ, जिसने देश में लोकतंत्र की मजबूत नींव रखी।
बिहार में चुनावी इतिहास और अपराध का मेल
1957 में बिहार में दूसरी बार चुनाव हुए, और इस बार राजनीति में मसल पॉवर और बूथ कैप्चरिंग जैसी नई प्रवृत्तियों का उदय हुआ। इस दौर में बाहुबली और अपराधी राजनीति का हिस्सा बन गए। बिहार में फुटानीबाज़ की परिभाषा उन अपराधियों के लिए इस्तेमाल होती है, जो खुद को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करते हैं और रौब झाड़ते हैं। बिहार की सरज़मीन पर ही देश के पहले राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद का घर है, और इसी क्षेत्र से निकले नटवर लाल ने अपने घर को बेचकर राजनीति में कदम रखा।
राजनीति और अपराध का संगम
बिहार में अपराधियों का राजनीति में प्रवेश और उनका प्रभाव इतना गहरा हो गया कि अपराध और राजनीति का मेल एक सामान्य बात बन गई। अपराधियों को चुनाव जीताने के लिए फुटानीबाज़ का सहारा लिया जाता था, जो बूथ लूटने से लेकर वोटिंग तक में शामिल थे। इन अपराधियों ने अपने नाम से खुले खत लिखकर गांव-गांव में प्रचार किया, जिसमें लिखा होता था कि किस उम्मीदवार को वोट देना है। यदि उम्मीदवार हार भी जाता, तो इन अपराधियों का आतंक फिर भी जारी रहता। इस तरह बिहार में कानून व्यवस्था का पतन हुआ और अपराध का राजनीति से गहरा संबंध स्थापित हो गया।
बिहार के खूनी नरसंहार और जातीय संघर्ष
बिहार में जातीय संघर्ष और नरसंहार की घटनाएं भी इस दौर की कड़वी सच्चाई हैं। बेलछी नरसंहार, बलेचि में दलितों का नरसंहार, बघौरा में राजपूतों का कत्लेआम, और लक्ष्मणपुर बाथे जैसे कई जघन्य अपराध इस क्षेत्र की जंगली और हिंसक छवि को दर्शाते हैं। इन घटनाओं ने बिहार की राजनीति और समाज को गहरे जख्म दिए। इन नरसंहारों के पीछे अपराधियों और नेताओं का गठजोड़ था, जिसने बिहार को हिंसा और आतंक का केंद्र बना दिया।
बिहार में अपराध और राजनीति का वर्तमान स्वरूप
1990 के दशक में बिहार में अपराध और राजनीति का गठजोड़ और भी मजबूत हो गया। भूमिहार और राजपूत जैसे समुदायों ने अपनी सुरक्षा के लिए रणवीर सेना जैसी निजी सेनाएं बनाईं। इन सेनाओं का उद्देश्य माओवादियों और अपराधियों का मुकाबला करना था, लेकिन जल्द ही ये भी आतंक का पर्याय बन गईं। इस दौर में चुनावी मैदान में अपराधियों का प्रवेश और उनका प्रभाव इतना बढ़ गया कि चुनाव जीतने के लिए हथियार और खून का सहारा लिया जाने लगा।
आधुनिक बिहार का अपराधीकरण और राजनीतिकरण
बिहार में अपराधियों का राजनीति में प्रवेश और उनका प्रभाव आज भी कायम है। चुनावी प्रक्रिया में अपराधियों का दखल और उनके साथ नेताओं का गठजोड़ अब भी जारी है। इस कारण बिहार की राजनीति और समाज में हिंसा, जातीय संघर्ष और अपराध का जहर फैलता रहा। इन घटनाओं ने बिहार को बदनाम किया और उसकी छवि को धूमिल किया। आज भी बिहार में अपराध और राजनीति का यह गठजोड़ एक चुनौती बना हुआ है, जो राज्य के विकास और स्थिरता के लिए खतरा है।










